235. जिन्हें नाज़ है हिंद पर वो कहाँ हैं!

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आज हम वर्ष 2018 में जी रहे हैं, सुना है हिंदुस्तान दुनिया की बड़ी ताक़त बन गया, आर्थिक शक्तिसंपन्न देशों में भारत की गिनती होने लगी है। कितने पैमाने होते हैं किसी देश की तरक्की को मापने, उन सबका उदाहरण देते हुए बताया जाता है कि भारतवर्ष कितना आगे बढ़ गया है!

एक बहुत पुराना पैमाना है, गोस्वामी तुलसीदास जी का बताया हुआ-

जासु राज सुन प्रजा दुखारी, सो नृप अवस नरक अधिकारी

और हम रामराज्य की कल्पना करते हैं, एक गाय को मारने अथवा ऐसा प्रयास करने में हमारे यहाँ लोग, कुछ इंसानों को मारने में भी संकोच नहीं करते।

रामराज्य के बारे में एक और उद्धरण गोस्वामी जी का याद आता है-

दैहिक, दैविक, भौतिक तापा
रामराज्य नहीं काहुई व्यापा।

मैं दलगत राजनीति की बात नहीं करना चाहता, सीधे बात करना चाहूंगा- देश की राजधानी दिल्ली में, तीन बच्चे भूख से मर गए। ये किसी भी समाज के लिए डूब मरने की बात है।

दिल्ली में- नगर की, केंद्र शासित क्षेत्र की और केंद्र की, दोनो सरकारें हैं। लेकिन मैं इस घटना को किसी पार्टी अथवा सरकार से नहीं जोड़ना चाहता। सबसे पहली बात तो यह है कि हमारे समाज में, आस-पड़ौस के लोगों को यह जानकारी होनी चाहिए कि उनके आस पास किसी परिवार में ऐसी स्थिति है कि बच्चों के भूख से मरने की नौबत आ रही है।

यह तीन बच्चों की नहीं, ये इंसानियत की मौत है, बेशक हमारी सरकारों को भी ऐसा तंत्र विकसित करना चाहिए कि कहीं ऐसी नौबत आने वाली है तो उसको पहचाना जाए और जरूरी कदम उठाए जाएं। और हाँ आस-पड़ौस के लोगों को भी सहायता के लिए तत्पर रहना चाहिए।

आज गुरुदत्त जी की फिल्म का एक गीत याद आ रहा है, जिसे यहाँ शेयर कर रहा हूँ। फिल्म प्यासा के इस गीत को साहिर लुधियानवी जी ने लिखा है और एस.डी.बर्मन जी के संगीत निर्देशन में मोहम्मद रफी साहब ने गाया है। प्रस्तुत है ये गीत-

ये कूचे, ये नीलामघर दिलकशी के
ये लुटते हुए कारवां जिंदगी के
कहाँ है, कहाँ है मुहाफ़िज़ खुदी के
जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहाँ हैं
कहाँ है, कहाँ है, कहाँ है …

ये पुरपेच गलियां, ये बदनाम बाज़ार
ये गुमनाम राही, ये सिक्कों की झंकार
ये इस्मत के सौदे, ये सौदे पे तकरार
जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहाँ हैं
कहाँ है, कहाँ है, कहाँ है …

ये सदियों से बेखौफ़ सहमी सी गलियां
ये मसली हुई अधखिली ज़र्द कलियां
ये बिकती हुई खोखली रंगरलियाँ
जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहाँ हैं
कहाँ है, कहाँ है, कहाँ है …

वो उजले दरीचों में पायल की छन-छन
थकी हारी सांसों पे तबले की धन-धन
ये बेरूह कमरो में खांसी की ठन-ठन
जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहाँ हैं
कहाँ है, कहाँ है, कहाँ है …

ये फूलों के गजरे, ये पीकों के छींटे
ये बेबाक नज़रें, ये गुस्ताख फ़िक़रे
ये ढलके बदन और ये बीमार चेहरे
जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहाँ हैं
कहाँ है, कहाँ है, कहाँ है …

यहाँ पीर भी आ चुके हैं, जवां भी
तनूमन्द बेटे, अब्बा मियां भी
ये बीवी भी है और बहन भी, माँ भी
जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहाँ हैं
कहाँ है, कहाँ है, कहाँ है …

मदद चाहती है ये हव्वा की बेटी
यशोदा की हम्जिन्स, राधा की बेटी
पयम्बर की उम्मत , जुलेखां की बेटी
जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहाँ हैं
कहाँ है, कहाँ है, कहाँ है …

ज़रा इस मुल्क के रहबरों को बुलाओ
ये कूचे ये गलियां ये मंज़र दिखाओ
जिन्हें नाज़ है हिन्द पर उनको लाओ
जिन्हें नाज़ है हिंद पे वो कहाँ हैं
कहाँ है, कहाँ है, कहाँ है …

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।


3 comments

  1. हिन्द पर किसको भी नाज़ न कभी था और न होगा, समय चाहे गुरु दत्त का हो या अरिजीत सिंह का,मान्यवर, भारत एक महान देश है औऱ भारतीय उतने ही गिरे हुये, हमें गर्व है कि हम भारत में पैदा हुये हैं, और शर्म है कि भारतीयों के बीच पैदा हुये हैं, अरे जो लोग सात आठ बरस की बच्ची को नहीं छोड़ रहे ,फिर उसके शव पर राजनीति करते हैं, ऐसे हिन्द पर नाज़ नहीं शर्म आती है, सरकार को सीखाना पड़ता है सफ़ाई रखने के लिये अरे कुत्ता भी बैठने से पहले पूंछ से साफ करता है, हिन्द पर नाज़ करें भी तो कैसे