242. दार-अस-सलाम – तंजानिया!

Posted by

 

यूएई में दुबई, शारजाह आदि देखने के बाद बारी थी, अगली मंजिल दार-अस सलाम की ओर बढ़ने की! दिल्ली से जाते समय ही हमने फ्लाइट की सभी टिकट बुक करा रखी थीं तथा दार-अस-सलाम के लिए एतिहाद एयरलाइंस की हमारी फ्लाइट आबू धाबी से थी, जबकि हम शारजाह में रह रहे थे। हमारे पास पड़ने वाले एयरपोर्ट शारजाह और दुबई के थे। लेकिन हमें वहाँ यह जानकारी मिली कि आबू धाबी से इस एयरलाइंस की फ्लाइट पकड़ने के लिए इनकी दुबई शाखा में यह सुविधा है कि आप वहाँ चेक-इन कर सकते हैं। आपको वहाँ से बोर्डिंग पास मिल जाएगा, सामान चेक-इन हो जाएगा और उनकी बस आपको आबू धाबी एयरपोर्ट छोड़ देगी। हाँ आपको इसके लिए पहले सूचना देकर निर्धारित बस में सीट सुरक्षित करानी होगी और समय पर वहाँ पहुंचना होगा। हमें यह सुविधा काफी अच्छी लगी, हमने इसका सदुपयोग किया और हम आराम से फ्लाइट पकड़ने के लिए आबू धाबी पहुंच गए।

आबू धाबी का एयरपोर्ट भी काफी सुंदर बनाया गया है और हम वहाँ से फ्लाइट द्वारा सही समय पर दार-अस-सलाम पहुंच गए। दुबई जाने पर हमारी घड़ी जहाँ डेढ़ घंटा पीछे खिसक गई थी, तंजानिया पहुंचने पर यह एक घंटा और पीछे हो गई। वहाँ का समय होता है जीएमटी+3 जबकि भारत में यह है- जीएमटी+ 5-30 घंटे। खैर दार-अस-सलाम के जूलियस न्येरेरे अंतर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट पर मेरा सबसे छोटा बेटा-तुषार, जो उस समय वहाँ सेवा कर रहा था, हमें लेने आ गया और हम उसके साथ घर पहुंच गए।

विकास की दृष्टि से तो पूर्वी अफ्रीका में स्थित तंजानिया और वहाँ पर दार-अस-सलाम भी काफी पिछड़े हैं, लेकिन इस दौड़ में आगे बढ़ने के लिए वे काफी मेहनत कर रहे हैं। वहाँ, विशेष रूप से तंजानिया में भारतीय और हिंदी समझने वालों की संख्या काफी अधिक है, समुद्र तट पर ‘बीच’ और उनके आसपास बने रेस्टोरेंट, बिल्कुल गोआ की तरह ही लगते हैं, वहाँ बाकायदा ग्रोसरी स्टोर आदि में भारतीयों की पसंद के सामान उपलब्ध हैं, पतंजलि के उत्पाद भी मिल जाते हैं और शाकाहारी रेस्टोरेंट आदि भी हैं, एक का तो नाम ही चौपाटी है! पूरा इलाका है वह जहाँ भारतीय रेस्टोरेंट आदि हैं।

वहाँ जो भारतीय सेवा कर रहे हैं, वे अपनी मेहनत और प्रतिभा के बल पर पैसा भी अधिक पाते हैं और काम के लिए समय भी अधिक देते हैं। जबकि स्थानीय लोगों में कुशलता कम है, उनको पैसा कम मिलता है और वे छुट्टी का समय होते ही काम छोड़ देते हैं। भारतीयों की प्रतिभा, मेहनत और वेतन के कारण, स्थानीय कर्मचारी उनसे ईर्ष्या भी करते हैं।
एक बात और दुबई में जाकर हम थोड़ा गरीब हो गए थे, क्योंकि वहाँ का एक दिरहम हमारे साढ़े अठारह रुपयों के बराबर होता है, जबकि तंजानिया जाकर हम बहुत अमीर हो गए, क्योंकि हमारा एक रुपया उनके 30 शिलिंग के बराबर होता है। भारतीय व्यवसायियों का वहाँ बाजार के काफी बड़े हिस्से पर कब्ज़ा है। इसलिए वहाँ हम ज्यादातर 1000 के नोटों में ही व्यवहार करते थे। रेस्टोरेंट में मिनरल वाटर के लिए भी 1000 का नोट देना पड़ता था।

 

एक बात और वहाँ करप्शन भी काफी है। हम एक बार समुद्र के किनारे गए, उस स्थान पर संभवतः कार खड़ी करने की अनुमति नहीं थी। वहाँ एक पुलिस वाला आ गया और चालान करने की बात करने लगा। मेरा बेटा वहाँ की भाषा में थोड़ी बहुत बात कर लेता था, उसने बात करने के बाद उसको 2,500 दिए, चाय-पानी के लिए। इतनी कम कीमत है वहाँ की करेंसी की।

वहाँ पर क्या कुछ हमने देखा, इसके बारे में कल बात करेंगे, आज बस एक-दो चित्र शेयर कर लेता हूँ।

नमस्कार।


2 comments

  1. सचित्र यात्रा विवरण बहुत अच्छा है ऐसा लगता है हम तंजानिया की सैर कर रहे हैं।
    आप सर ऐसे ही सचित्र यात्रा विवरण लिखते रहिये मुझे पढ़ने में बहुत अच्छा लगता है। और जानने का मन करता है।