आज फिर से प्रस्तुत है, एक और पुरानी ब्लॉग पोस्ट-

क़तील शिफाई जी की एक गज़ल याद आ रही है, क्या निराला अंदाज़ है बात कहने का! शायर महोदय, जिनकी नींद उड़ गई है परेशानियों के कारण, वो रात भर जागते हैं, आसमान की तरफ देखते रहते हैं और उनको लगता है कि सितारे भी उनके दुख में आज जाग रहे हैं, रोज तो सो जाते थे, दिखाई नहीं देते थे (सोने के बाद)।

लीजिए पहले इस गज़ल के शेर ही शेयर कर लेता हूँ-

परेशां रात सारी है, सितारो तुम तो सो जाओ,
सुकूत-ए-मर्ग ता’री है, सितारो तुम तो सो जाओ।

हमें भी नींद आ जाएगी, हम भी सो ही जाएंगे,
अभी कुछ बेक़रारी है, सितारो तुम तो सो जाओ।

हमें तो आज की शब पौ फटे तक जागना होगा,
यही क़िस्मत हमारी है, सितारो तुम तो सो जाओ।

तुम्हें क्या हम अगर लूटे गए राह-ए-मुहब्बत में,
ये बाज़ी हमने हारी है, सितारो तुम तो सो जाओ।

कहे जाते हो रो-रोकर हमारा हाल दुनिया से,
ये कैसी राज़दारी है, सितारो तुम तो सो जाओ।

अज्ञेय जी ने अपने उपन्यास ‘शेखर एक जीवनी’ में लिखा है, उसमें जो मुख्य पात्र है, क़ैदी है वह जेल की दीवारों पर कुछ बातें लिखता है, उनमें से ही एक है-

‘वेदना में शक्ति है, जो दृष्टि देती है, जो प्रेम करता है, वह स्वयं भले ही मुक्त न हो, यह प्रयास करता है कि जिससे वह प्रेम करता है, उसको मुक्त रखे’ (शब्द कुछ अलग होंगे, जैसा मुझे याद है, वैसा लिख दिया)।

श्री रमेश रंजक जी की गीत पंक्ति हैं, शायद पहले भी मैंने इनका उल्लेख किया हो-

दिन हमें जो तोड़ जाते हैं,
वो इकहरे आदमी से जोड़ जाते हैं।

पेट की पगडंडियों के जाल से आगे,
टूट जाते हैं जहाँ पर ग्लोब के धागे,
मनुजता की उस सतह पर छोड़ जाते हैं।

हम स्वयं संसार होकर, हम नहीं होते,
फूटते हैं रोशनी के इस क़दर सोते,
हर जगह से देह-पर्बत फोड़ जाते हैं।

इस गज़ल के बहाने फिर से दर्द की बात आ गई, ये ससुरी बिना बताए आ ही जाती है।

एक रूसी कहानीकार की कहानी याद आ रही है, शायद इसका भी उल्लेख मैंने पहले किया हो। एक तांगाचालक था, जिसका बेटा मर गया था। उसके बाद वह तांगा चलाता है, किसी न किसी बहाने से वह सवारियों को बेटे की मौत के बारे में बताना चाहता है। कोई नहीं सुनता, अंत में वह पूरी कहानी अपने घोड़े को सुनाता है और पूछता है, ‘तूने सुन ली न!’ और घोड़ा सिर हिलाता है।

आज की दर्द कथा, यहीं विश्राम लेती है!
नमस्कार|

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