249. अंतिम दिवस- आज जीवन का!

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और आखिर आज वह दिन आ ही गया!

मैं एक साधारण प्राणी, भारत में जन्मा इस बात का गर्व है मुझे। वैसे गर्व करने के लिए और बहुत सी बातें नहीं हैं मेरे पास, लेकिन संतोष है, जो कुछ हासिल हुआ उसके लिए।

भारत की राजधानी दिल्ली में जन्मा, बचपन गरीबी में बीता, फिर सेवा शुरू की जो बहुत कम वेतन वाली प्रायवेट नौकरियों से शुरू करके, सरकारी नौकरियों में क्रमशः नीचे से ऊपर की ओर उड़ान थी, इतनी कि वह मेरी बहुत निम्न स्तर से शुरू हुई यात्रा की दृष्टि से काफी अच्छी उड़ान मानी जा सकती है।

सेवा के दौरान, दिल्ली से प्रारंभ करके जयपुर, बिहार, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश बहुत से स्थानों पर तैनाती रही, कुछ समय अपने सपनों की नगरी मुंबई में रहने का भी अवसर मिला। रिटायर हुआ तो  गुड़गांव में कुछ वर्ष रहा और अंत में गोआ रहने के लिए आ गए!

रिटायरमेंट के बाद भारत के कुछ अन्य प्रदेशों और कुछ देशों में भी घूमने का अवसर मिल गया, जिनमें दुबई, शारजाह, तंजानिया, लंदन शामिल हैं!

आप सोच रहे होंगे कि मैं अपने जीवन की यह संक्षिप्त डॉक्युमेंट्री क्यों दिखा रहा हूँ!

मैंने शुरू में ही संकेत दिया था ना कि ‘वह दिन आ ही गया!’

यह वही दिन है कि जिसके बारे में लोग जीवन भर सोचने से डरते हैं।

जी हाँ कल से मैं इस दुनिया में विचरण नहीं करूंगा! लोग मेरे शरीर के साथ क्या क्रिया-कलाप करेंगे यह मुझे मालूम नहीं, लेकिन मुझसे मेरे ईश्वर का वादा है कि वह मुझे, अपने साथ ले जाएगा संभालकर।

बहुत समय पहले हुआ था, मेरे ईश्वर से मेरा संवाद। मैंने कोई बड़े पुण्य नहीं किए जीवन में, मैं उस लोक में कोई ऊंचा दर्जा, कोई मुकाम हासिल करने की अपेक्षा भी नहीं रखता। मैंने बस कोशिश की है कि दुनिया में किसी से नफरत न करूं। जहाँ तक हो सके लोगों के बीच प्रेम बांटू!

मेरी यही बात शायद ईश्वर को पसंद आई और उन्होंने एक बार संवाद किया था, मेरे साथ स्वप्न में! मैंने कुछ नहीं मांगा, बस ईश्वर ने स्वयं ही पूछा कि अपनी मृत्यु से पहले तुम उसके बारे में जानना चाहते हो?

मैंने कहा था कि बताना है तो एक दिन पहले ही बताना, मैं ज्यादा समय तक यह सूचना, इसका दबाव अपने मन में नहीं रखना चाहूंगा! मेरे ईश्वर ने एवमस्तु कहा था और वह स्वप्न समाप्त हो गया था!

उसके बाद ईश्वर कल रात मेरे सपने में आए, कहा- ‘कल मेरे साथ चलने के लिए तैयार हो?’ मैंने कहा बिल्कुल, आपके साथ जाने का अवसर मिलेगा, इससे बड़ी क्या बात है! मुझे, मेरे कर्मों के हिसाब से जिस स्थिति में रखना, वो आपका फैसला, लेकिन मैं आपके साथ जाऊंगा, ये सफर ही मेरे जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

और फिर आज का सवेरा हुआ! मुझे मालूम था कि यही दिन बाकी है अब, अपने इस लोक के प्रियजनों के बीच! सुबह तैयार होकर मैं लंबी सैर पर निकल गया, ईश्वर का शुक्र है कि इस दुनिया से जाने के समय मेरे हाथ-पैर सलामत हैं, मुझे लगता है कि अगर पैदल जाने का भी रास्ता हो वहाँ तक, इस शरीर के साथ तो मैं उसका प्रयास भी कर सकता हूँ!

सैर से लौटकर आया तो अपने अनेक प्रियजनों को फोन मिलाया, सामान्यतः मैं स्वयं फोन बहुत कम मिलाता हूँ, जो आसपास हैं और जल्दी मिलने का प्रोग्राम बना रहे थे उनसे मैंने कहा कि आज ही मिल लो, अगर आ सको तो!

आज मैंने टेलीविजन नहीं खोला, अखबार भी एक किनारे पड़ा रहने दिया। पत्नी ने कहा कि क्या बात है, आज न टीवी न अखबार, आज खबर है कि सरकार पेंशन बढ़ाने के बारे में विचार कर रही है, मैंने कहा करने दो, ये उनका काम है।

उस दिन एक बात घर के लोगों को थोड़ी अजीब लग रही थी, मैंने प्रत्येक सदस्य से पूछा कि वह कैसा है, जैसे बेटों से पूछा कि उनके ऑफिस में काम कैसा चल रहा है, कोई परेशानी तो नहीं है। शायद यही छोटा सा परिवर्तन था, जो सबने महसूस किया।

इसके बाद मैं कविता के फॉर्मेट में कुछ कागज़ पर लिखने लगा-

आज धरा पर अंतिम दिन है!
एक बात कही थी ईश्वर से,
मैं नहीं मांगता लंबा जीवन,
बस जितना हो मेरे हिस्से में,
जिऊं उसे पूरे मन से।

जो कुछ बना, किया जीवन में,
पछतावा नहीं कदाचित भी!
था नहीं सिकंदर मैं जिसको,
दुनिया कर फतह दिखानी थी,
कोशिश बस इतनी थी,
कि जीतूं दिल,
जितने संभव हों!
सबके दिल तो, हे प्रभु-
आप भी कब जीत पाए हैं!

उस दिन कुछ नज़दीकी लोग मिलने भी आ गए, वे बोले भी कि आज तो आपने फोन किया, हम तो ये उम्मीद ही नहीं करते कि आप फोन करोगे! मैं बहुत हद तक अंतर्मुखी जो हूँ!

उस दिन सबने साथ मिलकर रात्रि-भोजन किया, कुछ मेहमान भी साथ थे, पत्नी के लिए काफी काम बढ़ गया था, उनमें से कुछ लोग रुक भी गए। एक-दो ऐसे, जिनके साथ बैठकर सोमरस का पान भी किया, शायद इसको बहाना बनना था!

ऐसा मेरे घर में सामान्यतः नहीं होता, शायद जीवन में यह दूसरा ही अवसर था, जब मैंने घर में बैठकर शराब पी थी, वह भी दो-तीन साथियों के साथ।

इसके बाद क्या हुआ, वो सब छोड़िए ना, आपको मेरे जाने की खबर सुनने की बहुत बेचैनी है!

कहते हैं ना कि मनुष्य को हर दिन ऐसे ही जीना चाहिए, जैसे यह जीवन का अंतिम दिन है! फिर मेरे जैसा इंसान, जिसके ऊपर देखा जाए तो आज की तारीख में कोई ज़िम्मेदारी नहीं है, उसको उठकर चलने में क्या दिक्कत है, फिर कहीं भी क्यों न जाना हो!

हाँ इधर, जिसे मृत्युलोक कहते हैं, यहाँ बाद में जो कुछ भी हो! यहाँ के दुखी लोगों के लिए मेरी संवेदनाएं!

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।
‘Today Is Your Last Day On Earth’
‘This post is a part of Write Over the Weekend, an initiative for Indian Bloggers by BlogAdda.’


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