आज फिर से प्रस्तुत है, एक और पुरानी ब्लॉग पोस्ट-

आज अपने ही एक गीत के बहाने बात कर लेता हूँ। शायद मैंने यह कविता पहले भी शेयर की हो, जब मैंने शुरू के अपने ब्लॉग, अपने जीवन के विभिन्न चरणों के बहाने, अपने बचपन से प्रारंभ करके लिखे थे, उस समय तो यहाँ ब्लॉग की साइट पर मैं खुद ही लिखने वाला और खुद ही पढ़ने वाला था। बाद में मालूम हुआ कि हम एक-दूसरे को फॉलो करें तभी उनके ब्लॉग पढ़ पाएंगे और तभी हमारे ब्लॉग भी पढ़े जा सकेंगे।

अभी मेरे कुछ ऐसे संपर्क बने हैं, आशा है आगे यह संख्या और बढेगी, तब मैं शायद अपने शुरू के ब्लॉग भी री-ब्लॉग करूंगा, जिनसे मुझे बहुत लगाव है। उनमें उन बहुत से शानदार लोगों का ज़िक्र है, जिनके संपर्क में आने का मुझे अवसर मिला।

अब अपना वह गीत शेयर कर लेता हूँ, जिसे आज आपके समक्ष रखना चाह रहा हूँ। भूमिका के तौर पर इतना कि कुछ वर्षों तक मैंने नवगीत लिखे, थोड़ा बहुत मंचों पर भी गया। वहाँ के नाटक भी देखे, जहाँ कविगण वैसे विद्रोही तेवर दिखाते हैं, लेकिन सुविधाएं पाने के लिए कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं। वैसे यह कविता के ही नहीं, जीवन के हर क्षेत्र में लागू होती है।

प्रस्तुत है मेरा यह नवगीत-

एकलव्य हम
मौसम के फूहड़ आचरणों पर व्यंग्य बाण,
साधे पूरे दम से, खुद को करके कमान,
छूछी प्रतिमाओं को दक्षिणा चढ़ानी थी
यह हमसे कब हुआ।

कूटनीति के हमने, पहने ही नहीं वस्त्र,
बालक सी निष्ठा से, लिख दिए विरोध-पत्र,
बैरी अंधियारे से कॉपी जंचवानी थी,
यह हमसे कब हुआ।

सुविधा की होड़ और विद्रोही मुद्राएं,
खुद से कतराने की रेशमी विवशताएं,
खुले हाथ-पांवों में, बेड़ियां जतानी थी,
यह हमसे कब हुआ।
                                                                  (श्रीकृष्ण शर्मा)

नमस्कार

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