(Image Courtesy- Twitter)

स्व. राज कपूर जी द्वारा अभिनीत फिल्म- सपनों का सौदागर का एक गीत है-

सपनों का सौदागर आया, ले लो ये सपने ले लो,
तुमसे किस्मत खेल चुकी, तुम किस्मत से खेलो।

इसी गीत में आगे एक पंक्ति है-

वो तय कर लेगा मंज़िल, जो एक सपना अपनाए!

और हाँ, राज कपूर धुन के पक्के थे, फिल्मों का निर्माण, उनके ही साथ जीना, उनका एक बहुत बड़ा सपना था। इसी सपने को बड़ा स्वरूप देने के लिए राज कपूर जी ने ‘आर के स्टूडियो’ का निर्माण किया, जो फिल्म निर्माण की एक बहुत बड़ी प्रयोगशाला है, यह अपने आप में एक दर्शनीय स्थान बन गया था। फिल्म के लिए बहुत भव्य सेट इसमें मौजूद थे।

स्व. राज कपूर के पिता स्व. पृथ्वीराज कपूर स्वयं एक समर्पित कलाकार थे, जो इप्टा से जुड़े रहे थे और उन्होंने अपने सपने को ‘पृथ्वी थिएटर’ का स्वरूप प्रदान किया, जिसे उनके बाद उनके छोटे बेटे – स्व. शशि कपूर देखते रहे, यहाँ आज भी स्तरीय नाटकों का मंचन होता है।

खैर हम आर. के. स्टूडिओ का ज़िक्र कर रहे थे, जो राज कपूर का एक भव्य सपना था, जिसकी एक एक ईंट पर उनकी मेहनत और समर्पण अंकित थे। उन समर्पित कलाकारों का स्वर्गवास हो गया, न पृथ्वीराज कपूर रहे और न उनके बेटे- राज कपूर और शशि कपूर। शम्मी कपूर भी एक महान कलाकार थे, लेकिन अलग तरह के, उनकी इन क्षेत्रों में अधिक रुचि शायद नहीं थी।

हाँ तो राज कपूर जी की मृत्यु के बाद, शायद 7-8 महीने पहले ही यह खबर आई थी कि आर.के.स्टूडिओ में आग लग गई और सब कुछ जलकर खाक हो गया! जाहिर है कि पूरी तरह से जलना तभी संभव है, जब वहाँ कोई गतिविधि न चल रही हो! ऐसा लगता है कि नई पीढ़ी के लोगों ने, जिनमें से ऋषि कपूर और उनके बेटे रणबीर कपूर स्वयं अच्छे और सफल कलाकर हैं, लेकिन शायद उनकी आर.के.स्टूडिओ को संचालित करने में कोई रुचि नहीं है।

आज यह खबर आ रही कि ये लोग आर.के.स्टूडिओ को बेचने की तैयारी कर रहे हैं। यह स्टूडिओ जिसको राज कपूर ने, ‘मेरा नाम जोकर’ के निर्माण के बाद, लगभग दीवालिया हो जाने पर भी बिकने नहीं दिया था।
यह सब सुनकर जां निसार अख्तर साहब की लिखी   एक गज़ल का शेर याद आ रहा है, जो मुकेश जी ने गाई है-

पता नहीं कि मेरे बाद उनपे क्या गुजरी,
मैं चंद ख्वाब जमाने में छोड़ आया था।

आज के लिए इतना ही।

नमस्कार।