पिछली बार की तरह आज भी मैं विख्यात अंग्रेजी कवि श्री रॉबर्ट फ्रॉस्ट की एक कविता का भावानुवाद और उसके बाद मूल कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ। पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया कविता का भावानुवाद-

मैं रहा हूँ – रात से भली भांति परिचित।
मैं बरसात में निकला हूँ बाहर- और वापस भी आया हूँ बरसात में।
मैं शहर की सबसे आखिरी रोशनी को भी पार करके-
टहलता हुआ आगे निकल गया हूँ।

मैंने नगर की सबसे उदास गलियों में जाकर देखा है,
मैं रात में पहरेदार की चौकी के पास से गुज़रा हूँ,
अपनी आंखें नीची करके, क्योंकि मैं अपनी सफाई नहीं देना चाहता था।

मैं स्थिर होकर खड़ा हुआ हूँ, और अपनी पदचाप को भी दबा दिया है,
जब दूर से, कोई चीख रुक-रुक कर आई है,
मकानों के ऊपर होकर, दूसरी गली से,

लेकिन मुझे वापस बुलाने या अलविदा कहने के लिए नहीं;
फिर भी एक खोजी ऊंचाई पर,
आकाश की ओर स्थित प्रकाशमान घड़ी ने –

घोषणा की है, कि समय न तो गलत है न सही।
मैं रहा हूँ- रात से भली भांति परिचित।

                         रॉबर्ट फ्रॉस्ट </strong>

और अब मूल अंग्रेजी कविता-

I have been one acquainted with the night.
I have walked out in rain – and back in rain.
I have outwalked the furthest city light.

I have looked down the saddest city lane.
I have passed by the watchman on his beat
And dropped my eyes, unwilling to explain.

I have stood still and stopped the sound of feet
When far away an interrupted cry
Came over houses from another street,

But not to call me back or say good-bye;
And further still at an unearthly height,
One luminary clock against the sky

Proclaimed the time was neither wrong nor right.
I have been one acquainted with the night.

Robert Frost

नमस्कार।
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