समय निरंतर अविरल प्रवाह में बहता रहता है, आगे बढ़ता जाता है, उसमें कोई सीमा रेखाएं नहीं हैं, हाँ ग्रह-नक्षत्रों की गति, विशेष रूप से सूर्य के चारों ओर हमारी पृथ्वी की परिक्रमा के हिसाब से कुछ कैलेंडर विकसित किए गए हैं, उनमें से एक ईस्वी सन वाला कैलेंडर जो आज पूरी दुनिया में माना जाता है, जिसके हिसाब से हमारे  देश में भी लोगों की रोजी-रोटी चलती है, उस कैलेंडर के अनुसार आज एक वर्ष समाप्त हो रहा है। अब हम नए वर्ष का कैलेंडर लगाएंगे घर में, देखेंगे कि ग्रहों की दशा पर आधारित सूर्य-राशि के अनुसार हमारे आने वाले दिन-महीने कैसे होंगे।

नए कैलेंडर अब बाजार में आएंगे, कुछ लोगों को खरीदने होंगे, कुछ के पास कंपनियों द्वारा गिफ्ट किए गए कैलेंडरों और डायरियों का ढ़ेर हो जाएगा। एक कैलेंडर विजय माल्या जी छापते थे जिसमें हर महीने को सुंदर मॉडल्स के आकर्षक चित्रों के माध्यम से सुहाना दर्शाया जाता था। वह तो शायद अब नहीं मिलेगा क्योंकि माल्या जी के दिन ही अब सुहाने नहीं रहे।

खैर आज मैं साबिर दत्त जी की एक रचना, जिसे जगजीत सिंह जी ने गाया है, इसको शेयर करते हुए सभी को नए साल की शुभकामनाएं देता हूँ। आशा है कि इसमें जो बातें व्यंग्य के लहज़े में कही गई हैं, वे मेरे देश और दुनिया में, वास्तविक रूप में घटित होंगी-

इक बिरहमन ने कहा है कि ये साल अच्छा है।

ज़ुल्म की रात बहुत जल्द टलेगी अब तो

आग चूल्हों में हर इक रोज़ जलेगी अब तो,

भूख के मारे कोई बच्चा नहीं रोएगा

चैन की नींद हर एक शख़्स यहाँ सोएगा,

आँधी नफ़रत की चलेगी न कहीं अब के बरस

प्यार की फ़स्ल उगाएगी ज़मीं अब के बरस

है यक़ीं अब न कोई शोर-शराबा होगा

ज़ुल्म होगा न कहीं ख़ून-ख़राबा होगा

ओस और धूप के सदमे न सहेगा कोई

अब मेरे देश में बेघर न रहेगा कोई, 

नए वादों का जो डाला है वो जाल अच्छा है

रहनुमाओं ने कहा है कि ये साल अच्छा है

दिल के ख़ुश रखने को ग़ालिब ये ख़याल अच्छा है!

पुनः आप सभी को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं।

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