Posts for February 2019

चंपा का फूल

आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि  गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत […]

43. रात लगी कहने सो जाओ देखो कोई सपना!

आज फिर प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग- मैंने अपने शुरू केे ब्लॉग्स में बचपन  से लेकर वर्ष 2010 तक, जबकि मेरे सेवाकाल का समापन एनटीपीसी ऊंचाहार में हुआ, तब तक अपने आसपास घटित घटनाओं को साक्षी भाव से देखने […]

इतना सा मेरापन!

आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि  गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत […]

Traditions or Best Practices!

There was a story I read  in my childhood. In that story a person who had gone for pilgrimage, puts the money he had with him, in a copper vessel and places  it in a hole he dug in the […]

Gadgets with a better design!

I do not feel well versed with the modern gadgets, for example there are many functions in the mobile phone sets, which I am not comfortable in using. I do not find myself in a position to find faults in […]

कोल्हापुर-महाराष्ट्र

कल शुरू किया था एक यात्रा विवरण, आज उसको निपटा लेता हूँ। जहाँ गया था ‘बारामती’, वहाँ तक का तो बस रास्ता ही तय किया, कुछ मंदिर हैं वहाँ पर, उनको भी नहीं देख पाया, शाम होते-होते सोचा कि अब […]

रास्ता सिर्फ!

यात्रा संबंधी ब्लॉग में अक्सर किसी ऐसे स्थान पर जाकर वहाँ का अनुभव शेयर किया जाता है, जहाँ कोई प्राकृतिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक अथवा राजनैतिक महत्व और आकर्षण होता है, लेकिन वास्तव में यात्रा का अनुभव भी अपने आप में बहुत […]

सुनहरी नाव

आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत […]

है नमन उनको, कि जिनके सामने बौना हिमालय!

यादों के समुंदर से एक और मोती, लीजिए प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग, थोड़े संपादन के साथ! मैंने लखनऊ प्रवास का ज्यादा लंबा ज़िक्र नहीं किया और ऊंचाहार के सात वर्षों को तो लगभग छोड़ ही दिया, क्योंकि मुझे […]

On being Flexible!

I remember some characters seen in some movies. Say some retired military official, who enforces strict discipline in his house. Like everybody in the family to be present on the dining table exactly at 8 PM, anybody who is late […]

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