आज रफी साहब का गाया एक बेहद खूबसूरत गीत याद आ रहा है।है। यह गीत 1968 में रिलीज़ हुई फिल्म- हमसाया के लिए रफी साहब ने ओ.पी.नैयर साहब के संगीत निर्देशन में बड़ी खूबसूरती के साथ गाया है और इसके लेखक थे- ज़नाब शेवान रिज़वी जी।


इस गीत में नायक यही कहता है कि उसे, उसके बारे में सुनी गई बातों के आधार पर नहीं बल्कि उसके दिल, उसके व्यवहार के आधार पर समझा जाए क्योंकि लोग कई बार, दूसरे लोगों के बारे में बहुत गलत धारणा बना देते हैं, खास तौर पर अगर किसी का वक़्त खराब चल रहा हो।
अब ज्यादा क्या कहना, लीजिए इस प्यारे से गीत को याद कर लेते हैं-

 

दिल की आवाज़ भी सुन
मेरे फ़साने पे न जा
मेरी नज़रों की तरफ़ देख
ज़माने पे न जा।

इक नज़र देख ले जीने की इजाज़त दे दे
रूठने वाले वो पहली सी मुहब्बत दे दे
इश्क़ मासूम है
इल्ज़ाम लगाने पे न जा
मेरी नज़रों की तरफ़ देख
ज़माने पे न जा।

वक़्त इनसान पे ऐसा भी कभी आता है
राह में छोड़ के साया भी चला जाता है
दिन भी निकलेगा कभी
रात के आने पे न जा
मेरी नज़रों की तरफ़ देख
ज़माने पे न जा।

मैं हक़ीक़त हूँ ये इक रोज़ दिखाऊँगा तुझे
बेगुनाही पे मुहब्बत की रुलाऊँगा तुझे
दाग दिल के नहीं मिटते हैं
मिटाने पे न जा
मेरी नज़रों की तरफ़ देख
ज़माने पे न जा।

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

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