यात्रा संबंधी ब्लॉग में अक्सर किसी ऐसे स्थान पर जाकर वहाँ का अनुभव शेयर किया जाता है, जहाँ कोई प्राकृतिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक अथवा राजनैतिक महत्व और आकर्षण होता है, लेकिन वास्तव में यात्रा का अनुभव भी अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण होता है, जो प्रमुख स्थान हैं उनके बारे में तो काफी साहित्य होता ही है और बहुत सारे यात्रा ब्लॉगर इन प्रमुख स्थलों के बारे में ब्लॉग लिख चुके होते हैं।

आज मैं एक ऐसी यात्रा के अनुभव शेयर करना चाहता हूँ जहाँ मंज़िल बहुत प्रसिद्ध नहीं थी। यह यात्रा थी, मेरे अपने स्थान-पंजिम, गोवा, जो स्वयं बहुत प्रसिद्ध है, वहाँ से महाराष्ट्र के एक शहर- बारामती तक, जिसे शायद ज्यादा लोग नहीं जानते होंगे। एक लंबे अंतराल के बाद बस द्वारा लंबी यात्रा का अनुभव किया और इस यात्रा के दौरान पूरा सफर मैंने बस द्वारा ही किया। कुल मिलाकर यह अधिकांश रूप से यात्रा का अनुभव ही है, जिसमें मंज़िल पर पहुंचना अधिक महत्वपूर्ण नहीं है।

हाँ तो यात्रा का प्रारंभ मैंने रात 9-30 बजे की स्लीपर बस से किया, एक प्रायवेट बस सेवा थी। मुझे बस में स्लीपर पर यात्रा करना अधिक पसंद नहीं है, इसलिए मैंने ऑनलाइन बुकिंग द्वारा एक सीट ही चुनी थी। बस में पहुंचने पर मालूम हुआ कि जो सीट मुझे मिली थी उसकी साइड में ही ऊपर स्लीपर पर चढ़ने के लिए सीढ़ी लगी थी। एक तरह से उस सिंगल सीट पर बैठने के बाद सवारी पूरी तरह बंधन में हो जाती थी, हिल-डुल भी नहीं सकते। खैर कुछ समय बाद एक अन्य सीट खाली मिल गई और मैं काफी कष्ट से बच गया!

 

जैसा मैंने शुरू में कहा यह मुख्य रूप से यात्रा, यानि ‘सफर’ का अनुभव है, जो हिंदी का कम, अंग्रेजी का ‘सफर’ ज्यादा था। मैंने लंबे समय के बाद, मुख्य रूप से रात में, बस के द्वारा यह सफर  किया! मुझे जाना था- बारामती, महाराष्ट्र का एक छोटा सा नगर, और जैसा मुझे बताया गया था मुझे ‘सतारा’ में उतरकर वहाँ से दूसरी बस पकड़नी थी। लेकिन जो समय मैंने चुना, वह ऐसा कि मैं सुबह चार बजे ‘सतारा’ में हाइवे पर उतरा, जहाँ कंडक्टर ने मुझे बताया कि यहाँ उतरना होगा। जहाँ मैं उतरा वहाँ एलिवेटेड सड़क थी, रात 4 बजे का समय, बसें, ट्रक आदि तो आ-जा रहे थे, लेकिन आसपास कोई ऐसा व्यक्ति नहीं जो यह बता सके कि बस कहाँ से पकड़नी है!

रात के समय एक किलोमीटर से ज्यादा दूरी तक चलने के बाद एलिवेटेड सड़क समाप्त हुई, एक रेस्टोरेंट मिला, वहाँ चाय पीकर पूछा, बताया गया कि नीचे वाली सड़क से काफी दूर तक वापस जाने के बाद, पुल के नीचे से सड़क के दूसरी तरफ जाना है, जहाँ बस मिल सकेगी। यह अनुभव भी काफी जटिल था, पूरा विवरण नहीं लिखूंगा, काफी लंबा चलने के बाद, फिर बहुत देर इंतज़ार करने के बाद, रास्ते के एक स्थान तक के लिए बंद जीप की सवारी मिली, जहाँ से आगे के लिए फिर बस पकड़नी थी। क्योंकि सामान्य बस सेवा चालू होने के लिए सुबह 8 बजे तक इंतज़ार करना था, और वहाँ एक-डेढ़ घंटा बिताने के बाद भी अभी सुबह के साढ़े पांच ही बजे थे।

वैसे बारामती, महाराष्ट्र के पुणे क्षेत्र में एक छोटा सा शहर है, यहाँ कुछ मंदिर हैं, जिनका दर्शन किया जा सकता है। मैं वहाँ एक मीटिंग के लिए गया था लेकिन रात में बस का सफर करने के बाद, दिन का अधिकांश समय मैंने निद्रा में ही बिता दिया और फैसला किया कि अगली रात में फिर बस यात्रा करूंगा।

जहाँ पिछले वर्षों में बड़े-बड़े स्थानों की यात्रा की है, जिनमें दुबई और इंग्लैंड भी शामिल हैं, बस द्वारा देश के बहुत कम जाने हुए क्षेत्र की यह यात्रा एक अलग ही तरह का अनुभव दे गई। ऐसी यात्रा, जहाँ बस भी नहीं मिलती तो लोग ट्रक आदि में लिफ्ट लेकर आगे बढ़ते हैं।

आज का विवरण यहीं बंद करता हूँ, शायद आपको कल की यात्रा में, अंग्रेजी के ‘सफर’ के अलावा भी कुछ अनुभव मिल जाएगा।

नमस्कार।