आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Unyielding’ का भावानुवाद-

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

अडिग

जब मैंने तुम्हें, तुम्हारे बगीचे में बुलाया,
बौर आ चुके आमों में लुभावने वाली गंध आ रही थी-
तब भी तुम क्यों इतनी दूर रहीं,
अपने द्वार तुमने इतना कसकर बंद रखे?
बौर आने के बाद वे फलों के गुच्छों में बदल गए-
तुमने मेरे हाथों में भरे फलों को अस्वीकार कर दिया,
और अपनी आंखें कसकर बंद कर लीं।.

बैसाख माह के भयंकर, प्रबल तूफानों के बीच,
सुनहरे पके फल शाखाओं से टूटकर नीचे गिर पड़े,
मैंने कहा, ऐसे प्रसाद को धूल अशुद्ध कर देती है:
‘अपने हाथों को इनके लिए स्वर्ग बन जाने दो’,
तुमने फिर भी कोई मैत्री भाव नहीं दिखाया।

संध्या के समय तुम्हारे द्वार पर कोई दीप नहीं जला था,
घनघोर अंधेरा था, जब मैंने अपनी वीणा बजाई।
किस प्रकार सितारों की रोशनी ने, मेरे हृदय के तारों को झंकृत किया!
किस प्रकार मैंने अपनी वीणा को नृत्य में लीन कर दिया!
पर तुमने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

उदास पक्षी सोये नहीं, चहकते रहे,
अपने साथियों को पुकारते, पुकारते।
हमारे मिलन का सही समय निकल जाने के बाद-
नीचे पहुंच गया चांद, जबकि तुम अभी भी मान कर रही थीं,
और चांद अपनी एकांत समाधि में डूब गया।

कौन दूसरे को समझ सकता है !
हृदय अपने आवेग पर काबू नहीं कर पाता।
मुझे आशा थी कि कुछ बची हुई
आंसुओं में डूबी यादें, तुम्हे विचलित कर देंगी,
तुम्हारे एहसास को झकझोर कर सहज बना देंगी।

रात्रि के धुंधला रहे कंठहार की पकड़ ढीली होते-होते चांद, ,
धीरे-धीरे सुबह के कदमों पर गिर पड़ा।
जब तुम सो रही थीं, तब क्या मेरी वीणा ने
अपनी हृदय की पीड़ा से, तुम्हें थपकियां दी थीं? कम से कम,  तुमने
आनंद भरे स्वप्न ही देखे थे क्या?

-रवींद्रनाथ ठाकुर

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

Unyielding

When I called you in your garden
Mango blooms were rich in fragrance –
Why did you remain so distant,
Keep your doors so tightly fastened?
Blossoms grew to ripe fruit-clusters –
Your rejected my cuppded handfuls,
Closed your eyes to perfectness.

In the fierce harsh storms of Baisakh,
Golden ripened fruit fell tumbling.
‘Dust, I said, ‘defiles such offerings:
Let your hands be heaven to them.’
Still you showed no friendliness.

Lampless were your doors at evening,
Pitch-black as I played my vina.
How the starlight twanged my heartstrings!
How I set my vina dancing!
You showed no responsiveness.

Sad birds twittered sleeplessly,
Calling, calling lost companions.
Gone the right time for our union –
Low the moon while still you brooded,
Sunk in lonely pensiveness.

Who can understand another!
Heart cannot restrain its passion.
I had hoped that some remaining
Tear-soaked memories would sway you,
Stir your feet to lightsomeness.

Moon fell at the feet of morning,
Loosened from the night’s fading necklace.
While you slept, O did my Vina
Lull you with its heartache? Did you
Dream at least of happiness?

-Rabindranath Tagore

नमस्कार।