महान इंसान और अमर गायक मुकेश जी के गाये, ऐसे प्रेमगीतों के क्रम में जिनमें नायिका का सौंदर्य वर्णन बहुत सुंदर रूप में किया गया है, आज भी मैं ऐसा ही एक और प्रसिद्ध गीत शेयर कर रहा हूँ|


आज का गीत 1968 में रिलीज हुई फिल्म- ‘साथी’ के लिए मजरूह सुल्तानपुरी जी ने लिखा था, जिसे मुकेश जी ने नौशाद जी के संगीत निर्देशन में, बेहद खूबसूरत तरीके से गाया था।

आइए आज इस प्यारे से गीत को याद कर लेते हैं, जिसमें नायिका के सौंदर्य को एक अलग अंदाज़ में अभिव्यक्त किया गया है, जो बहुत पवित्र भावनाएं लिए हुए है और मुकेश जी ने अपनी वाणी में इसे अमरता प्रदान कर दी है –

 

हुस्न-ए-जाना इधर आ, आईना हूँ मैं तेरा,
मैं सवारूँगा तुझे, सारे ग़म दे दे मुझे,
भीगी पलकें ना झुका, आईना हूँ मैं तेरा।

कितने ही दाग उठाए तूने,
मेरे दिन-रात सजाए तूने,
चूम लूँ आ मैं तेरी पलकों को,
दे दूँ ये उम्र तेरी ज़ुल्फों को,
ले के आँखों के दिये, मुस्कुरा मेरे लिए,
मेरी तस्वीर-ए-वफ़ा, आईना हूँ मैं तेरा।

तेरी चाहत है इबादत मेरी,
देखता रहता हूँ सूरत तेरी,
घर तेरे दम से है मंदिर मेरा,
तू है देवी मैं पुजारी तेरा,
सजदे सौ बार करूँ, आ तुझे प्यार करूँ,
मेरी आगोश में आ, आईना हूँ मैं तेरा।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।