दो-तीन दिन के लिए गोवा छोड़कर, बेटे के पास बंगलौर में हूँ, जिसने नई नौकरी जॉइन की है और इसलिए वह कुछ समय के लिए फोर्स्ड बेचलर भी है।

टाउनशिप कहें या नेबरहुड कहें, कैसे-कैसे बसने लगे हैं, शहर के अंदर एक नया नगर, जहाँ यह प्रयास है कि निवासियों को अपनी ज़रूरतों के लिए शहर न जाना पड़े। और वहाँ से निकलकर बाहर, नगर के मुख्य मार्ग के लिए भी उनके वाहन से आना पड़ता है, अगर आप स्वयं वाहन नहीं चलाते हैं तब!

बस बेटे की फोर्स्ड बेचलर वाली स्थिति देखी तो जगजीत सिंह जी के गाए पंजाबी टप्पे याद आ गए, आज वही शेयर कर रहा हूँ। इन टप्पों के माध्यम से कुंवारे लोगों की तरफ से कुछ बहुत समाजवादी किस्म की मांगें रखी गई हैं।

चूल्हे आग न घड़े दे विच पानी
ओ छड्या दी जून बुरी,
ओये रब्बा, ओये रब्बा
रब्बा साड्डी वी बना दे कोई रानी,
वे छड्यां दी जींद बुरी।

लारा लप्पा, लारा लप्पा लाई रखदा,
अडी टप्पा, अडी टप्पा लाई रखदा।

काम कर करके जद्दों वी घर आइदा,
मार मार फूंका चूल्हे विच थक जाइदा,
रोटी कच्ची-गिल्ली पैंदी ए खानी,
रोटी कच्ची-गिल्ली पैंदी ए खानी
ओये रब्बा, ओये रब्बा
रब्बा साड्डी वी बना दे कोई रानी,
के छड्यां दी जून बुरी
ओ छड्यां दी जून बुरी।

दस्सिए कहानी किंवे छड्यां दे दिल दी,
सानूं तां गांवांड रातों आग वी न मिलदी,
दस्सिए कहानी किंवे छड्यां दे दिल दी,
के सानूं तो गांवाद रातों आग वी न मिलदी,
साडे लड वीं तू लादे कोई रानी।
के छड्यां दी जून बुरी।

जे छड्डे दी मा मर जावे,
ओ कल्ला बैठा सोग मनावे,
कोई जनानी डरदी ओदे घर पिट्टां वी ना आवे!

दस्सिए कहानी किंवे छड्यां दे दिल दी,
के सानूं तां गावांद राती आग वी न मिल दी,
साडे लाड दी लवा दे कन्जी कानी,
ओ छड्यां दी जींद बुरी
ओये रब्बा, ओये रब्बा
लारा लप्पा, लारा लप्पा लाई रखदा,
आडी टप्पा, आडी टप्पा लाई रखदा।

इक्को इक वोटी रब्बा छड्यां नू मंगदा,
सानूं ना खयाल रब्बा गोरे-काले रंग दा,
इक्को इक, इक्को इक, इक्को इक, इक्को इक,
सारेयां वास्ते इक्को,
चाहे नंवी होवे चाहे हो पुरानी,
ओ छड्यां दी जून बुरी

रब्बा साड्डी वी बना दे कोई रानी
लारा लप्पा, लारा लप्पा लाई रखदा,
आडी टप्पा, आडी टप्पा लाई रखदा।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।