आज एक अलग किस्म का गीत याद आ रहा है। अलग तरह का इसके पुरुष गायक के कारण! जी हाँ, जब गायक लोग स्टेज प्रोग्राम में गाते हैं, तो अक्सर यह चेक करते हैं कि साउंड सिस्टम में पर्याप्त  ‘ईको’ है या नहीं, जिससे उनकी आवाज उभरकर आए। यह गीत है आशा भौंसले जी और भूपेंद्र सिंह जी के युगल स्वरों में, और मैं भूपेंद्र सिंह जी के बारे में ही बात कर रहा था।

भूपेंद्र जी के स्वर में जो अनुगूंज शामिल है, संभव है किसी फास्ट गीत को गाने के लिए उनको ‘ईको’ कम करने की ज़रूरत पड़ती है। यह गीत 1985 में रिलीज़ हुई फिल्म- ‘ऐतबार’ के लिए सुरेश ओबेराय जी, राज बब्बर जी और डिंपल कपाडिया जी पर फिल्माया गया था और भूपेंद्र जी की अनुगूंज से भरी मर्दानी आवाज, सुरेश ओबेराय जी पर पूरी तरह फिट बैठती है। संगीत- भप्पी लाहिड़ी जी का है।

लीजिए प्रस्तुत है यह प्यारा सा गीत-

किसी नज़र को तेरा, इंतजार आज भी है,
कहाँ हो तुम कि ये दिल बेकरार आज भी है।

किसी नज़र को तेरा, इंतजार आज भी है।

वो वादियाँ, वो फिजाएं कि हम मिले थे जहाँ
मेरी वफ़ा का वहीं पर मज़ार आज भी है।
किसी नज़र को तेरा, इंतजार आज भी है।

न जाने देख के क्यूँ उनको ये हुआ एहसास
कि मेरे दिल पे उन्हें इख्तियर आज भी है।
किसी नज़र को तेरा, इंतजार आज भी है।

वो प्यार जिसके लिए हमने छोड़ दी दुनिया,
वफ़ा की राह में घायल वो प्यार आज भी है।
यकीं नही है मगर, आज भी ये लगता है
मेरी तलाश में शायद बहार आज भी है।
किसी नज़र को तेरा, इंतजार आज भी है।

ना पूछ कितने मोहब्बत में जख्म खाए हैं
कि जिनको सोचके दिल सोगवार आज भी है।
कहाँ हो तुम कि ये दिल बेकरार आज भी है।
किसी नज़र को तेरा, इंतजार आज भी है।

ज़िंदगी क्या कोई निसार करे,
किसे दुनिया में कोई प्यार करे,
अपना साया भी अपना दुश्मन है,
कौन अब किसका ऐतबार करे, ऐतबार करे।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।