अभी कुछ दिन पहले ही आस्था (फेथ) पर एक प्रस्तुति दी थी। आज खयाल आ रहा है कि ‘प्रेम’ या उर्दू शायरी की ज़ुबान में कहें तो ‘इश्क़’ भी आस्था का बहुत बड़ा संबल होता है। जो प्रेम में होता है, वह स्वयं के लिए भले ही आस्तिक न हो, अपने प्रियजनों के लिए आस्तिक बन जाता है, और बड़ी से बड़ी चुनौती का सामना कर लेता है।


श्री दशरथ माझी का उदाहरण यही बताता है कि इंसान पहाड़ से भी टकरा जाता है।
आज जगजीत सिंह जी और चित्रा सिंह जी की युगल जोड़ी द्वारा गाई गई बहुत प्यारी सी गज़ल याद आ रही है, जिसके शायर हैं- ज़नाब सईद राही जी। लीजिए यह गज़ल आज के लिए प्रस्तुत है-

मेरे जैसे बन जाओगे
जब इश्क़ तुम्हें हो जाएगा।
दीवारों से टकराओगे,
जब इश्क़ तुम्हें हो जाएगा।

हर बात गंवारा कर लोगे,
मन्नत भी उतारा कर लोगे,
ताबीज़ें भी बँधवाओगे,
जब इश्क़ तुम्हें हो जाएगा।

तनहाई के झूले झूलोगे,
हर बात पुरानी भूलोगे,
आईने से घबराओगे,
जब इश्क़ तुम्हें हो जाएगा।

जब सूरज भी खो जाएगा
और चाँद कहीं सो जाएगा
तुम भी घर देर से आओगे,
जब इश्क़ तुम्हें हो जाएगा।

                                            बेचैनी जब बढ जायेगी,                                                    और याद किसी की आयेगी,
                                         तुम मेरी ग़ज़लें गाओगे,                                                     जब इश्क़ तुम्हें हो जायेगा।

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।