आजकल चुनाव का मौसम है और एक के बाद एक नेताओं के असली चेहरे जनता के सामने उजागर हो रहे हैं। कुछ नेता तो ऐसे हैं, नवजोत सिंह सिद्धू जैसे- जो एक पार्टी से दूसरी में क्या गए, पूरा चरित्र ही बदल गया उनका। मुझे लगता है सिद्धू शायद इस बात का बहुत सटीक उदाहरण है कि आज के राजनेता कैसे हैं!


यूं ही किसी समाचार चैनल पर सिद्धू महाराज के कुछ नए-पुराने भाषणों की रिकॉर्डिंग देखी थी। क्या गज़ब के भाषण थे, जो-जो बातें कल मोदी जी की तारीफ में की थीं, बिल्कुल वही आज सोनिया जी और राहुल बाबा पर चस्पां कर दी हुज़ूर ने।

राजनीति में अच्छे लोग तलाशना तो वैसे ही कठिन काम है, लेकिन एक बात कहने का मन होता है कि शायद भारत की सबसे पुरानी पार्टी, आज जिस संस्कार विहीन व्यक्ति को अपने अध्यक्ष के रूप में ढो रही है, वह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। खैर राजनीति पर ज्यादा लंबी बात नहीं करूंगा, जल्दी ही जनता अपना फैसला दे देगी अगले 5 सालों के लिए।

मुझे गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रामचरित मानस में लिखी गई चौपाइयों में से दो अलग-अलग संदर्भों की पंक्तियां याद आ रही थीं। वैसे देखा जाए तो मानस से हम हर परिस्थिति में मार्गदर्शन प्राप्त कर सकते हैं।

एक पंक्ति जो मुझे याद आ रही है, बहुत सुंदर पंक्ति है; प्रभु श्रीराम के स्वभाव के बारे में-

कोमल चित्त, अति दीनदयाला,
कारण बिनु रघुनाथ कृपाला।

क्या स्वभाव है, तुलसीदास जी के प्रभु का! अत्यंत कोमल हृदय वाले! किसी कारण से हम पर कृपा करने वाले तो बहुत मिल जाएंगे, आजकल नेता लोग भी वोट पाने के लिए कृपा बरसा रहे हैं, लेकिन बिना कारण लोगों पर कृपा करने वाले तो भगवान श्रीराम ही हैं।

यहीं मुझे संत लोगों के बारे में तुलसीदास जी द्वारा किया गया विस्तृत वर्णन भी याद आता है, जिसमें वे कहते हैं-

संत हृदय नवनीत समाना!

लेकिन फिर स्पष्ट करते हैं कि मक्खन (नवनीत) तो अपने को गर्मी लगने से पिघलता है, लेकिन संत तो दूसरे का दुख देखकर ही पिघल जाते हैं!

फिर वे संतों की विशेषता बताने के लिए दूसरा उदाहरण देते हैं-

वंदऊं संत समान चित, हित-अनहित नहीं कोय,
अंजलि गत शुभ सुमन जिमि, सम सुगंध कर दोय।

जिस प्रकार अंजुरी में पुष्प लेने से, उनके कारण व्यक्ति की दोनों हथेलियां महक जाती हैं, ऐसा ही संतों का स्वभाव होता है, सबका उपकार करने वाला।

अब इतनी तो हमें स्वतंत्रता है ही कि हम राजनीति की बात करते-करते भी संतों की बात कर सकते हैं। वैसे आजकल तो राजनीतिज्ञों के अलावा महात्मा वेशधारी लोगों से भी डर लगता है।

इतना ही कहने का मन है कि राजनीतिज्ञों में आस्था हो या न हो, ईश्वर में आस्था होने से बहुत बल मिलता है, प्रयास तो हमें खुद करने ही होंगे, परंतु हमारी आस्था, हमारा विश्वास- हमारी कामयाबी के लिए बहुत बड़ा संबल बन सकता है।

अंत में कुछ खास प्रकार के प्राणियों का उल्लेख, जो राजनीति में तो खूब मिलते ही हैं।

जैसे प्रभु श्रीराम बिना कारण के कृपा करते हैं, वैसे ही दुष्ट मनुष्य (खल) बिना कारण बाधाएं उत्पन्न करते हैं, आपत्तियां करते हैं, और इसीलिए गोस्वामी जी ने रामचरितमानस लेखन के प्रारंभ में ही इनकी वंदना की है, जिससे वे उनके इस पुनीत कार्य में बाधा उत्पन्न न करें। अंत में ये पंक्ति भी प्रस्तुत है-

वंदऊं खल अति सहज सुभाए,
जे बिनु बात दाहिने-बाएं।

मैं इस खल-वंदना के साथ अपना आलेख समाप्त करता हूँ जी!

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।