कुछ मंचों पर, साप्ताहिक रूप से जो विषय दिए जाते हैं ब्लॉग में आलेख लिखने के लिए, उनमें से ही इस बार #IndiSpire में यह विषय सुझाया गया था कि लोग अपने क्षेत्र अथवा दुनिया में किसी भी क्षेत्र से जुड़ी कोई प्रेम कहानी के संबंध में कोई रोचक आलेख लिखें। इस विषय में विचार करने पर लैला-मजनू, शीरीं-फरहाद आदि की प्रचलित प्रेम कहानियां याद आती हैं, जिनमें प्रेमी-प्रेमिका मिल नहीं पाते और अनेक प्रकार की यातनाएं प्रेमी झेलता है, दीवाना बनकर घूमता है।


विचार करने पर मुझे लगा कि मैं ऐसा आलेख तो नहीं लिख पाऊंगा जिसे मैं इस मंच पर साझा कर सकूं, लेकिन मेरा मन हुआ कि ऐसे ईश्वरीय प्रेम के बारे में लिखा जाए, जिसकी कोई मिसाल दुनिया में नहीं मिलती है!

योगीराज श्रीकृष्ण, जिन्हें हम ईश्वर का एल अवतार और सोलह कलाओं से संपूर्ण मानते हैं। जीवन का हर चरण उनका अद्वितीय है। बचपन है तो ऐसा कि उस पर सूरदास जी जैसे भक्त कवियों ने आस्था, प्रेम और वात्सल्य से परिपूर्ण अमर काव्य लिखा है। यौवन जिया तो ऐसा कि उस प्रेम की कोई मिसाल दुनिया में नहीं मिलती। राधा जी का श्रीकृष्ण जी से विवाह नहीं हुआ था, लेकिन उनका नाम हमेशा कृष्ण जी के नाम के साथ और उनसे पहले लिया जाता है। यह प्रेमी युगल, जिसमें श्रीकृष्ण जी को उनके श्याम वर्ण और नील वर्ण का भी कहा गया है और राधा रानी स्वर्णिम रंग की है और इनके बारे में महाकवि बिहारी ने बड़ी सुंदर पंक्तियां लिखीं हैं, जिनको श्लेष अलंकार का बहुत सुंदर उदाहरण माना जाता है।

मेरी भवबाधा हरौ, राधा नागरि सोय।
जा तन की झाँई परे स्याम हरित दुति होय।।

और फिर विषय प्रेम का है, इसलिए उस पर ही कुछ कहूंगा। ऐसा कहा जाता है कि स्वामी विवेकांद जी जब अमेरिका में विश्व धर्म संसद को संबोधित करने गए थे, तब वहाँ उनके प्रवास के दौरान यह घटना हुई थी। उनसे पूछा गया कि यह कैसे संभव है कि जब श्रीकृष्ण जी बांसुरी बजाते थे तब सभी नर-नारी, पशु आदि भी उधर खिंचे चले जाते थे। इस विषय पर बोलते हुए स्वामी जी अपने स्थान से चलकर काफी दूर तक चले गए और श्रोतागण भी उनके साथ-साथ चलते गए। बाद में स्वामी जी ने कहा कि जब मेरे साथ ऐसा संभव है, तब भगवान श्रीकृष्ण तो योगीराज और सोलह कलाओं से परिपूर्ण थे, उनके बारे में क्या कहा जाए!

प्रेम की बात मैंने शुरू की थी, इसके बारे में एक उदाहरण देना चाहूंगा! गोपियों के साथ श्रीकृष्ण जी के प्रेम को आत्मा और परमात्मा के प्रेम की तरह माना जाता है। श्रीकृष्ण जी जब गोकुल छोड़कर चले गए और गोपियां उनके विरह में परेशान थीं, तब वे अपने विद्वान साथी उद्धव से कहते हैं कि वह गोपियों को जाकर समझा दे। विद्वान उद्धव मानता है कि यह तो उसके लिए बाएं हाथ का खेल है। वह अपने ज्ञान के बल पर उनको समझा देगा कि यह सब मोह-माया है। होता फिर यह है कि गोपियां ही उद्धव की गुरू बन जाती हैं, उसका पूरा ज्ञान वहाँ जाकर निष्फल हो जाता है।

यह विषय तो वैसे लंबी चर्चा योग्य और बहुत गहराई वाला है, लेकिन मैं यहाँ इस पर संक्षेप में चर्चा को, सूरदास जी के शब्दों में, गोपियों की कही इस बात के साथ संपन्न करना चाहूंगा-

ऊधो मन न भए दस-बीस,
एक हुतोहुतो सो गयो स्याम संग को अवराधै ईस।
इंद्री सिथिल भई केशव बिनु, ज्यों देहि बिनु सीस।
आसा लागि रहत तन स्वासा, जीवहिं कोट बरीसबरीस॥

तुम तो सखा स्याम सुंदर के, सकल जोग के ईस,
सूर हमारे नंदनंदन बिनु और नहीं जगदीस।

आज की प्रेम-चर्चा मैं यहीं पर समाप्त करना चाहूंगा, जहाँ विशुद्ध प्रेम के आगे विद्वत्ता नतमस्तक हो जाती है।
नमस्कार।