एक और विषय, जो एक मंच पर ब्लॉग पोस्ट लिखने के लिए दिया गया था। उस विषय के बहाने यहाँ अपने विचार व्यक्त कर रहा हूँ, जिसे कह सकते हैं ‘नॉन पार्टिसिपेटिव एंट्री’। विषय था कोई ऐसा अनुभव जिसको आप तर्क के आधार पर नहीं समझा सकते! मेरे पास अपना ऐसा कोई अनुभव नहीं है अतः मैं वहाँ अपना आलेख प्रस्तुत नहीं कर रहा हूँ, परंतु अलग से यहाँ अपने विचार प्रस्तुत कर रहा हूँ।

मुझे एक बात याद आ रही है, जो मैंने कहीं पढ़ी थी। मैं कभी आचार्य आशो रजनीश जी का व्याख्यान सुनने तो नहीं गया, कुछ पुस्तकें उनकी अवश्य पढ़ी हैं। यह कहा जाता है कि उनके व्याख्यान स्थल पर लिखा रहता था-‘ अपना दिमाग और जूते, बाहर छोड़कर आएं।’ एक बात और कहीं पढ़ी थी कि एक पत्रकार को उनके किसी प्रतिद्वंद्वी पक्ष द्वारा उनका व्याख्यान सुनकर यह बताने के लिए भेजा गया कि वो ऐसा क्या बोलते हैं कि इतने सारे लोग उनको सुनने के लिए जाते हैं! वह पत्रकार उनके व्याख्यान सुनकर बहुत प्रभावित हुआ और उनका शिष्य बन गया।

बाद में उस पत्रकार ने उनको बताया कि वह किस उद्देश्य से वहाँ आया था। उस पत्रकार ने उनसे पूछा कि इतने लोग उनका व्याख्यान सुनने आते हैं, फिर ऐसा क्यों हुआ कि वह ही उनका शिष्य बन गया। इस पर रजनीश जी ने कहा कि मेरे व्याख्यान के लिए ये लोग टिकट लेकर भाषण सुनने आते हैं। इनका यह प्रयास होता है कि वे उस पैसे का परिणाम वसूल करें, जो उन्होंने खर्च किया है। वास्तव में वे मन से, पूरी तन्मयता से भाषण को सुनते ही नहीं हैं, वे केवल पैसा वसूल करते हैं। आपको यह काम सौंपा गया था कि आप मेरा भाषण सुनकर उस पर रिपोर्ट दो, इसलिए आपने पूरे ध्यान से भाषण सुना और आप इस हद तक प्रभावित हो गए कि मेरे शिष्य बन गए।

जब मैं एनटीपीसी की सेवा में था, तब मेरे एक विद्वान मित्र थे- डॉ. श्यामाकांत द्विवेदी, मध्यप्रदेश के सीधी जिले में वे अध्यापक थे और बहुत अच्छा व्याख्यान देते थे। मैं अक्सर उनको कर्मचारियों के लिए चलाई जाने वाली हिंदी कक्षाओं में व्याख्यान के लिए बुलाया करता था।

डॉ. द्विवेदी के बारे में आगे बताने से पहले उनका एक रोचक संस्मरण याद आ रहा है, जो उन्होंने स्वयं मुझे सुनाया था। वे एक सरकारी स्कूल में पढ़ाते थे, देहाती किस्म के इलाके में, अब कितने गंभीर होते हैं वहाँ पर छात्र, यह तो अनुमान आप लगा ही सकते हैं। उनकी यह आदत थी कि व्याख्यान देते समय वे अपनी आंखें बंद कर लेते थे और बोलते जाते थे। एक बार जब काफी समय तक बोलने के बाद उन्होंने आंखें खोलीं तो पाया कि उनके सामने छात्र नहीं भेड़-बकरियां हैं। इस बीच छात्रों ने यह शरारत कर दी थी, लेकिन एक बार तो उनको लगा कि कोई चमत्कार हो गया क्या?

जी हाँ, चमत्कार की बात मैं इसलिए कह रहा हूँ कि वे तंत्र-मंत्र-साधना के काफी अच्छे ज्ञाता थे, उन्होंने इस विषय में कई पुस्तकें भी लिखी थीं। एक पुस्तक उन्होंने मुझे भी दी थी, लेकिन सच्चाई यह है कि मैं उसे पढ़ ही नहीं पाया!

हाँ तो मुझे उनका बताया हुआ एक अनुभव ही अभी याद आ रहा है। उन्होंने जब ध्यान में सफलता प्राप्त की, तब शुरू में वह बहुत परेशान हो गए थे, जैसा कि उन्होंने मुझे बताया कि जब वे आंखें खोलते तब जो दिखाई देता, वही उनको तब दिख रहा था, जब वे आंखें बंद कर रहे थे। कुछ समय तो वे यह नहीं जान पा रहे थे कि उनकी आंखें खुली हैं या बंद, बाद में उन्होंने अपने इस अनुभव को संतुलित किया।

तर्कातीत अनुभव या कहें कि चमत्कारों की तो भारत में कमी नहीं है और हम चमत्कारों के पीछे भागते भी बहुत ज्यादा हैं। इसी कारण हम पाते हैं कि नए-नए देवता और नए-नए गुरू सामने आते जाते हैं। ये भी मालूम होता है कि अब अमुक देवता के दर पर भीड़ कम होती है और अमुक देवता की मार्केट ज्यादा है।

यह विषय ऐसा है कि इस पर बहुत कुछ कहा जा सकता है। यह सच है कि जीवन में, या कहें कि दुनिया में ऐसा बहुत कुछ जिसे तर्क के आधार पर परिभाषित नहीं किया जा सकता, चमत्कार भी हैं बहुत सारे, लेकिन यह चमत्कार-पिपासा कहीं हमें धोखे में डालने के लिए न इस्तेमाल की जा सके, इसके लिए सावधान रहना बहुत जरूरी है, अन्यथा हम चमत्कार के बहाने किसी ढोंगी गुरू के अंधभक्त बन सकते हैं।

अंत में गोस्वामी तुलसीदास जी की एक पंक्ति याद आ रही है, जो शायद सबसे बड़े चमत्कार की और संकेत करती है-

सोई जानहि, जेहि देऊ जनाई,
जानत तुम्हहि, तुम्हहि होई जाई।

आज के लिए इतना ही।

नमस्कार।