आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘She Dwelt Here’ का भावानुवाद-

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता


यहीं रहती थी वह!

यहीं रहती थी वह, खंडहर हो चुकी सीढ़ियों वाले तालाब के किनारे। बहुत सी शामों को उसने देखा था, शाम में सूरज को चक्कर खाते बांस की पत्तियों के पीछे,
और बहुत से बरसात वाले दिनों में, भीगी मिट्टी की सौंधी गंध
उसके घर तक आती थी, धान की छोटी-छोटी टहनियों को लांघते हुए।

लोगों द्वारा उसको दिया गया नाम, यहाँ खजूर-ताड़ के वृक्षों में
और उन आंगनों को याद है, जहाँ लड़कियां बैठकर सर्दियों के लिए रजाई में टांके लगाते हुए, बात करती हैं। 

तालाब का जल, अपनी गहराइयों में, यादें समोए हुए है
उसके तैरने वाले अंगों और गीले पैरों की, जो अपनी छाप छोड़ते थे,
दिन-प्रतिदिन, गांव को जाने वाली पगडंडी पर।

महिलाएं जो आज आती हैं, अपने बर्तन लेकर पानी भरने को
उन सभी ने, देखा है, हंसी-मजाक में खिलने वाली उसकी मुस्कान को , अपने बैलों को नहलाने ले जाने वाले वृद्ध किसान भी, प्रतिदिन उसके दरवाजे पर रुककर उसका अभिवादन करते थे।

बहुत सी यात्री-नावें इस गांव से होकर गुजरती हैं; बहुत से यात्री सुस्ताते हैं, वटवृक्ष के नीचे; फेरा लगाने वाली बहुत सी नावें, नदी-मार्ग से यात्रियों को बाजार तक ले जाती हैं; ; परंतु उनका ध्यान, गांव की सड़क के किनारे, ध्वस्त हो चुकी सीढ़ियों वाले, तालाब के किनारे इस स्थान पर नहीं जाता, -जहाँ रहती थी वह, जिसे मैं प्रेम करता हूँ।

-रवींद्रनाथ ठाकुर

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

She Dwelt Here

She dwelt here by the pool with its landing-stairs in ruins. Many an evening she had watched the moon made dizzy by the shaking of bamboo leaves,
and on many a rainy day the smell of the wet earth
had come to her over the young shoots of rice.

Her pet name is known here among those date-palm groves and
in the courtyards where girls sit and talk while stitching their
winter quilts.

The water in this pool keeps in its depth the memory
of her swimming limbs, and her wet feet had left their marks, day
after day, on the footpath leading to the village.

The women who come to-day with their vessels to the water have
all seen her smile over simple jests, and the old peasant, taking his bullocks to their bath, used to stop at her door every day to greet her.

Many a sailing-boat passes by this village; many a traveler takes rest beneath that banyan tree; the ferry-boat crosses to yonder ford carrying crowds to the market; but they never notice this spot by the village road, near the pool with its ruined landing-stairs, -where dwelt she whom I love.

-Rabindranath Tagore

नमस्कार।