लीजिए चुनाव के परिणाम भी आ गए। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने धन्यवाद देते हुए कहा कि ‘जनता ने इस फक़ीर की झोली भर दी’। प्रधानमंत्री के उच्च पद पर सुशोभित व्यक्ति की इस सरलता को ‘लुटियंस दिल्ली’ के खास किस्म का चश्मा पहनने वाले बुद्धिजीवी नहीं समझ पाएंगे।


चुनाव परिणामों पर चर्चा के दौरान किसी चैनल पर एक व्यक्ति ने कहा-‘हम ‘बिटवीन द लाइंस’ पढ़ने में इतने डूब गए कि हम ‘राइटिंग ऑन द वॉल’ नहीं पढ़ पाए! जो भी हो सामान्य जन में तो जोश बहुत था मोदी सरकार को फिर से सत्ता में लाने का और जनता ने उनको कुछ ज्यादा ही संख्या बल दे दिया है।

लोकतंत्र में विपक्ष भी मजबूत होना चाहिए लेकिन विपक्ष ने राज्य सभा में अपने संख्या बल का किस प्रकार दुरुपयोग किया है, ये किसी से छिपा नहीं है। जनहित के कई बिल उन्होंने पारित नहीं होने दिए, जिनमें मुस्लिम महिलाओं पर अत्याचार का विरोधी ‘ट्रिपल तलाक बैन’ बिल भी है। एक ऐसी प्रथा जिसे अधिकतम मुस्लिम राष्ट्रों ने भी नकार दिया है लेकिन हमारे वोटकामी पॉलिटिशियन उसको नहीं जाने दे रहे हैं।

कमियां सभी पार्टियों में हैं, बीजेपी में भी हैं, लेकिन सरकार ने जनहित के जैसे कार्य पिछले 5 वर्षों में किए हैं, जिनमें उज्ज्वला योजना, मुफ्त इलाज की सुविधा, शौचालय, सुदूर गांवों तक सड़कें और बिजली, और गरीबों के लिए मकान भी, इन्हें अति बौद्धिकता के ‘मोतिया बिंद’ से ग्रस्त बुद्धिजीवी नहीं समझ पाएंगे।

अब जबकि मुझे लगता है कि कुछ समय बाद राज्य सभा वाला अवरोध भी समाप्त हो जाएगा, तब सरकार के पास ये कहने को नहीं रह जाएगा कि यह रुकावट थी, अब जो कुछ वो करेंगे उसके लिए पूरी तरह जवाबदेह होंगे!

इस बीच, अगले चुनावों तक विपक्ष के पास यह अवसर है कि वे एक भरोसेमंद विकल्प तैयार करें। न तो देश को 50 साल का ऐसा बालक चाहिए जो प्रचार के नाम पर गालियां देता घूम रहा था और न ऐसा अवसरवादी गठबंधन, जिसमें अपनी क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं वाले ऐसे दल जो एक दिन एक-दूसरे को भयंकर गाली देते हैं और दूसरे दिन मोदी के डर से गले मिल जाते हैं। ये सच्चाई है कि इन चुनावों में कोई प्रभावी विकल्प था ही नहीं।

बीजेपी के लिए भी यह बहुत जरूरी है अपने गंदी ज़ुबान वाले नेताओं को नियंत्रित करे या बाहर का रास्ता दिखाएं और पूरा ध्यान जनता के हित पर दें।

आज के लिए इतना ही, लोकतंत्र के इस उत्सव के संपन्न होने पर सभी को बधाई।

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार।