आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘I Hunt For The Golden Stag’ का भावानुवाद-

 

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता

मुझे तलाश है सुनहरे हिरण की

मैं भटक रहा हूँ, सुनहरे हिरण की तलाश में।
मुस्कुरा सकते हो आप, मेरे मित्रो, लेकिन मैं
तलाश रहा हूँ, वह दृष्टि, जो मेरे हाथ नहीं आ रही है,
मैं दौड़ता फिरता हूँ पहाडों और घाटियों में, मैं भटकता हूँ
अनाम प्रदेशों में, क्योंकि मुझे तलाश है
सुनहरे हिरण की।

आप आते हैं, खरीदारी करते हैं बाजार में
और फिर अपने घर वापस लौटते हैं, लदे हुए
सामान से, लेकिन बेघर हवाओं की शृंखला ने
पता नहीं कब मुझे कब और कहाँ
ऐसा छुआ है कि- .
मेरे मन में कोई परवाह बाकी नहीं है, मेरी सारी
संपत्ति की, जो मैंने कहीं दूर पीछे छोड़ दी है।

मैं भागता रहता हूँ, पहाड़ों और घाटियों में, मैं भटकता हूँ
अनाम प्रदेशों में—क्योंकि मैं शिकार
पर निकला हूँ, सुनहरे हिरण के।

-रवींद्रनाथ ठाकुर

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

 

I Hunt For The Golden Stag

I hunt for the golden stag.
You may smile, my friends, but I
pursue the vision that eludes me.
I run across hills and dales, I wander
through nameless lands, because I am
hunting for the golden stag.

You come and buy in the market
and go back to your homes laden with
goods, but the spell of the homeless
winds has touched me I know not when
and where.

I have no care in my heart; all my
belongings I have left far behind me.
I run across hills and dales, I wander
through nameless lands–because I am
hunting for the golden stag.

-Rabindranath Tagore

नमस्कार।