कल मैंने राजकपूर जी की प्रसिद्ध फिल्म- ‘संगम’ का एक गीत शेयर किया था, फिर खयाल आया कि इस फिल्म के सभी गीत लाजवाब थे। हर गीत का इस सुपर हिट प्रेम-त्रिकोण आधारित फिल्म की कहानी को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण रोल था।

जैसे दो गीत ग्लैमर और राज साहब की शोमैनशिप की मिसाल थे- ‘बोल राधा बोल संगम होगा कि नहीं’ और ‘मैं का करूं राम मुझे बुड्ढ़ा मिल गया’। इन दो गीतों को तो मैं छोड़ देता हूँ, लेकिन अन्य कम से कम तीन गीतों को मुझे अवश्य शेयर करने का मन हो रहा है।

आज जो गीत मैं शेयर कर रहा हूँ वह गीत भी है और प्रेमपत्र भी है। यह गीत रफी साहब की मधुर आवाज में है। जिस प्रकार अन्य कलाकारों की फिल्मों मे मुकेश साहब के गाने कभी-कभार ही पाए जाते हैं, वैसे ही राज साहब की फिल्मों में रफी साहब के गाने कम ही होते थे, क्योंकि राज साहब की आवाज तो मुकेश जी ही थे या कभी-कभी मन्ना डे जी। यह गीत भी राजेंद्र कुमार साहब पर फिल्माया गया है। गीत लिखा है- हसरत जयपुरी जी ने और संगीत तो शंकर जयकिशन जी का है ही।


लीजिए अब बिना किसी भूमिका के इस मधुर गीत के बोल प्रस्तुत कर रहा हूँ–

मेहरबां लिखू, हसीना लिखू या दिलरुबा लिखू
हैरान हू कि आप को इस खत में क्या लिखू?

ये मेरा प्रेम पत्र पढ़कर कि तुम नाराज़ ना होना,
के तुम मेरी जिंदगी हो, कि तुम मेरी बंदगी हो।

तुझे मैं चाँद कहता था, मगर उस में भी दाग है,
तुझे सूरज मैं कहता था, मगर उस में भी आग है,
तुझे इतना ही कहता हूँ, कि मुझको तुम से प्यार है।

तुझे गंगा मैं समझूँगा , तुझे जमुना मैं समझूँगा
तू दिल के पास है इतनी, तुझे अपना मैं समझूँगा
अगर मर जाऊँ रूह भटकेगी तेरे इंतजार में।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।