आज एक पुरानी गज़ल याद आ रही है, जिसे अनूप जलोटा जी ने गाया है, शायद कुछ और कलाकारों ने भी गाया होगा। अब ये कवि-शायर लोग ही होते हैं, जो दुख में, गम में भी स्वाद ढूंढ लेते हैं। वैसे गज़ल में हर शेर स्वतंत्र होता है, इस गज़ल में कुछ शेर वास्तव में बहुत सुंदर बन पड़े हैं।

राज़ इलाहाबादी साहब की लिखी इस गज़ल में जैसे यह बात कि ‘रुख से ज़ुल्फें हटाकर चांद को ग्रहण से निकाल दीजिए’ अथवा दामन साफ है मेरा इसलिए कोई दोष लगा दीजिए, या आप अंधेरे में क्यों रहें, फिर से कोई घर जला दीजिए और यह कि जिसके पास जितना भंडार है, उसकी प्यास भी उतनी ज्यादा है, जैसे कि -‘समुंदर का कहना कि मुझको पानी पिला दीजिए’, लीजिए प्रस्तुत है ये प्यारी सी गज़ल-

 

लज़्ज़त-ए-ग़म बढ़ा दीजिए,
आप फिर मुस्कुरा दीजिए।

चाँद कब तक गहन में रहे,
अब तो ज़ुल्फ़ें हटा दीजिए।

मेरा दामन बहुत साफ़ है,
कोई तोहमत लगा दीजिए।

क़ीमत-ए-दिल बता दीजिए,
ख़ाक ले कर उड़ा दीजिए।

आप अँधेरे में कब तक रहें,
फिर कोई घर जला दीजिए।

इक समुंदर ने आवाज़ दी,
मुझ को पानी पिला दीजिए।

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।