कल एक गज़ल शेयर की थी राज़ इलाहाबादी साहब की और ये बात की थी कि कैसे कवि-शायर लोग दुख में, गम में भी स्वाद ढूंढ लेते हैं। आज भी गज़ल के माध्यम से आंसुओं के स्वाद की बात करेंगे, ‘ इस उम्र से हूँ लज्ज्ज़्त-ए- गिरियां से भी महरूम, यानि बहुत दिनों से आंसुओं का स्वाद नहीं चखा है। ज़नाब अहमद फराज़ साहब की लिखी इस प्रसिद्ध गज़ल को मेहंदी हसन साहब ने, रूना लैला जी ने और बहुत से कलाकारों ने गाया है।

इस गज़ल में प्रेमी-प्रेमिका के बीच यही कहा जाता है कि ठीक है लड़ाई है, लेकिन फिर बहुत से कारण गिनाए जाते हैं जिनके बारे में सोचकर उसे मिलने के लिए आना चाहिए, भले ही दिल दुखाने के लिए आए, आंसुओं का भूला हुआ स्वाद दिखाने के लिए आए या इसलिए आए कि लोगों को कैसे बताते रहें कि यह दूरी क्यों पैदा हो गई। लीजिए आज इस खूबसूरत गज़ल को एक बार फिर से याद कर लेते हैं-

 

रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ,
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ।

कुछ तो मिरे पिंदार-ए-मोहब्बत का भरम रख,
तू भी तो कभी मुझ को मनाने के लिए आ।

पहले से मरासिम न सही फिर भी कभी तो,
रस्म-ओ-रह-ए-दुनिया ही निभाने के लिए आ।

किस किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम,
तू मुझ से ख़फ़ा है तो ज़माने के लिए आ।

इक उम्र से हूँ लज़्ज़त-ए-गिर्या से भी महरूम,
ऐ राहत-ए-जाँ मुझ को रुलाने के लिए आ।

अब तक दिल-ए-ख़ुश-फ़हम को तुझ से हैं उम्मीदें,
ये आख़िरी शमएँ भी बुझाने के लिए आ।

 

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।