आज कुछ विचार आ रहे हैं दिमाग में और साथ ही एक पुराना गीत याद आ रहा है।
हम सभी ईश्वर के सामने जाते हैं अपनी-अपनी फरियादें, कामनाएं लेकर और चाहते हैं कि वे पूरी हो जाएं। आजकल इंस्टेंट रिज़ल्ट की उम्मीद में लोग बाबाओं के पास भी बड़ी तादाद में जाते हैं और इस तरह बहुत से बाबाओं कि प्रसिद्धि और समृद्धि बहुत तेजी से बढ़ी और उनमें से कुछ तो अपने महान कर्मों के बल पर जेल में भी पहुंच गए।

खैर मेरा यह विषय नहीं है आज, मैं तो एक ऐसी सत्ता के बारे में बात कर रहा हूँ, जो ईश्वर और इन बाबाओं से अलग है और यहाँ भी लोग युग-युगों से फरियाद करते आए हैं। खैर अब सस्पेंस नहीं बढ़ाऊंगा, लीजिए प्रस्तुत है ये बहुत ही प्यारा सा गीत, जो स्वतः स्पष्ट है।

1958 में बनी फिल्म ‘आखिरी दाव’ का यह गीत, मजरूह सुल्तानपुरी साहब ने लिखा था और मो. रफी साह्ब की अमर आवाज में यह गीत मदन मोहन जी के संगीत निर्देशन में तैयार किया गया था।

तुझे क्या सुनाऊँ मैं दिलरुबा,
तेरे सामने मेरा हाल है,
तेरी इक निगाह की बात है,
मेरी ज़िंदगी का सवाल है|

मेरी हर ख़ुशी तेरे दम से है,
मेरी ज़िंदगी तेरे ग़म से है,
तेरे दर्द से रहे बेख़बर,
मेरे दिल की कब ये मज़ाल है|

तेरे हुस्न पर है मेरी नज़र,
मुझे सुबह शाम की क्या ख़बर,
मेरी शाम है तेरी जुस्तजू,
मेरी सुबह तेरा ख़याल है|

मेरे दिल जिगर में समा भी जा,
रहे क्यों नज़र का भी फ़ासला,
कि तेरे बग़ैर ओ जान-ए-जां,
मुझे ज़िंदगी भी मुहाल है|

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।