आज कैफ भोपाली साहब की लिखी एक गज़ल याद आ रही है। वैसे तो गज़ल के सभी शेर स्वतंत्र होते हैं और वे अलग-अलग बात कह सकते हैं, लेकिन इस गज़ल में एक बात जो एक-दो शेरों में विशेष रूप से उभरकर आती है, वह है कि आस्था में बहुत बड़ी ताकत होती है। जहाँ आपमें विश्वास होता है, आस्था होती है- वह आपको बहुत शक्ति देती है।


और जब उम्मीद नहीं रहती, तब यही होता है- ‘दिल-ए-नादां न धड़क, कोई खत ले के पड़ौसी के घर आया होगा’, अथवा ‘मेरा दरवाजा हवाओं ने हिलाया होगा’। लेकिन जब विश्वास होता है तब- ‘गुल से लिपटी हुई तितली को गिराकर देखो, आंधियों तुमने दरख्तों को गिराया होगा’!

आज यही मन हो रहा है कि आस्था और विश्वास का संदेश देने वाली और जहाँ सब भरोसे खत्म हो गए हों, उस स्थिति की नाउम्मीदी को अभिव्यक्त करने वाली कैफ भोपाली साहब की यह गज़ल शेयर करूं, जिसे जगजीत सिंह साहब ने बहुत खूबसूरती से गाया था-

कौन आएगा यहाँ कोई न आया होगा,
मेरा दरवाजा हवाओं ने हिलाया होगा।

दिल-ए-नादाँ न धड़क ऐ दिल-ए-नादाँ न धड़क,
कोई ख़त ले के पड़ौसी के घर आया होगा।

इस गुलिस्ताँ की यही रीत है ऐ शाख़-ए-गुल,
तूने जिस फूल को पाला वो पराया होगा।

दिल की किस्मत ही में लिक्खा था अँधेरा शायद,
वरना मस्जिद का दिया किस ने बुझाया होगा।

गुल से लिपटी हुई तितली हो गिरा कर देखो,
आँधियों तुम ने दरख़्तों को गिराया होगा।

खेलने के लिए बच्चे निकल आए होंगे,
चाँद अब उस की गली में उतर आया होगा।

‘कैफ’ परदेस में मत याद करो अपना मकाँ,
अब के बारिश ने उसे तोड़ गिराया होगा।

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।