आज हिंदी गीतों के एक महान हस्ताक्षर स्व. गोपाल दास नीरज जी की याद आ रही है।

हिंदी कविता और विशेष रूप से मंचीय गीत कवियों में अलग-अलग कवियों का जमाना रहा था। एक समय था जब मंचों पर बच्चन जी बहुत लोकप्रिय थे, उन्होंने अपनी जीवनी में भी यह प्रसंग लिखा है कि कैसे एक व्यक्ति ने उनके काव्य ‘मधुशाला’ की पंक्तियां गुनगुनाते ट्रेन से कूदकर आत्महत्या कर ली थी। बच्चन ने इस प्रसंग का ज़िक्र करते हुए यह लिखा है कि उनका यह उद्देश्य तो नहीं था कि उनकी कविता किसी को पलायन के लिए प्रेरित करे।

कवि बहुत सारे रहे हैं, लेकिन मैं कहना चाहूंगा कि गीत-कविता में वैसी दीवानगी इसके बाद नीरज जी के लिए देखी गई थी। साहिर जी ने अपने एक फिल्मी गीत में लिखा है- ‘कल और आएंगे नगमों की खिलती कलियां चुनने वाले, मुझसे बेहतर कहने वाले, तुमसे बेहतर सुनने वाले’।

लेकिन सच्चाई है कि कवि कलाकारों को अपने जीवन-काल में ही ढलान का भी सामना करना पड़ जाता है। नीरज कवि सम्मेलन के मंचों से फिल्म जगत में गए, क्योंकि उनको स्व. मीना कुमारी जी जैसी एक काव्य पारखी मिल गई थीं और उन्होंने हिंदी फिल्मों को बहुत सारे अलग तरह के गीत दिए।

एक ज़माना था जब ‘नीरज निशा’ आयोजित की जाती थीं, जिनमें नीरज जी और उनके साथ एक हास्य-व्यंग्य के कवि- निर्भय हाथरसी, बस दो ही कवि होते थे और ये आयोजन पूरी रात चलता था। निर्भय जी भी इतने अधिक लोकप्रिय थे अपने समय कि कुछ कवि लगभग 100 कवियों की लिस्ट भेजकर लिखते थे कि अगर ‘निर्भय’ आएंगे तो वे सब नहीं आएंगे, क्योंकि निर्भय जी के होते हुए लोग उनको सुनते ही नहीं थे।
खैर मैं ‘नीरज’ जी की लोकप्रियता की बात कर रहा था, नीरज-निशा में निर्भय जी अक्सर यह कविता भी पढ़ते थे-

तुम गीतों के राजकुंवर हो, हम शब्दों के जादूगर।

इसी गीत में एक पंक्ति थी-

नीरज की कोई निशा नहीं है, निर्भय को कोई नशा नहीं।

ऐसा इसलिए कि नीरज (कमल का फूल) रात में नहीं खिलता और इस गीत में उन्होंने नीरज जी के नशे का भी संकेत किया है, जो उनका बहुत बड़ा दुश्मन साबित हुआ!
खैर बाद में ‘नीरज’ जी को वे दिन भी देखने पड़े जब उनका स्वास्थ्य अच्छा नहीं रहता था और वे ठीक से काव्यपाठ भी नहीं कर पाते थे। अपने कम लोकप्रियता वाले इन दिनों का ज़िक्र करते हुए, नीरज जी ने यह बहुत सुंदर गीत लिखा था, जिसमें उन्होंने जीवन दर्शन भी बहुत सुंदर तरीके प्रस्तुत कर दिया है।

लीजिए प्रस्तुत है स्व. गोपाल दास ‘नीरज’ जी का यह गीत-

मैं जिस मौसम का राजा था,
वो मौसम तो गुज़र गया,
पता नहीं वो जाने वाला-
इधर गया या उधर गया।

चाक समय का, घट माटी का
था, जो हम जीवन समझे,
इक रंगीन तमाशा था, जो
उसको हम यौवन समझे,
बच्चा इक मेले में आकर,
खुद से हो बेखबर गया।

पता नहीं वो जाने वाला
इधर गया या उधर गया।

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।