आज हिंदी गीतों के एक अत्यंत लोकप्रिय हस्ताक्षर रहे स्व. रामावतार त्यागी जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ। इस गीत में त्यागी जी ने एक जुझारू कलाकार के जज़्बे को अभिव्यक्ति दी है, जो यह हौसला रखता है कि वह अपने समर्पण और सृजनशीलता के बल पर दुनिया को रोशनी प्रदान करेगा। कवि का समर्पण और उसकी निष्ठा को इस गीत में बड़ी जानदार अभिव्यक्ति मिली है। एक बात और रचनाकर्म अलग बात है, परंतु बहुत से कवि-कलाकारों का जीवन ऐसा रहा है, अच्छी रचनाएं देने वाले भी बहुत से ऐसे कलाकार रहे हैं, जो किन्हीं अन्य कारणों से बदनाम रहे हैं। यहाँ कवि यह भी कहता है कि उसे उसकी रचना के माध्यम से ही पहचाना जाए!

लीजिए प्रस्तुत है स्व. रामावतार त्यागी जी का यह प्रसिद्ध गीत-

इस सदन में मैं अकेला ही दिया हूं
मत बुझाओ!
जब मिलेगी रोशनी मुझसे मिलेगी!

पांव तो मेरे थकन ने छील डाले,
अब विचारों के सहारे चल रहा हूं,
आंसुओं से जन्म दे–देकर हंसी को,
एक मंदिर के दिए–सा जल रहा हूं,
मैं जहां धर दूं कदम, वह राजपथ है,
मत मिटाओ!
पांव मेरे, देखकर दुनिया चलेगी!

बेबसी, मेरे अधर इतने न खोलो,
जो कि अपना मोल बतलाता फिरूं मैं,
इस कदर नफ़रत न बरसाओ नयन से,
प्यार को हर गांव दफ़नाता फिरूं मैं,
एक अंगारा गरम मैं ही बचा हूं
मत बुझाओ!
जब जलेगी, आरती मुझसे जलेगी!

जी रहे हो जिस कला का नाम लेकर,
कुछ पता भी है कि वह कैसे बची है,
सभ्यता की जिस अटारी पर खड़े हो,
वह हमीं बदनाम लोगों ने रची है,
मैं बहारों का अकेला वंशधर हूं
मत सुखाओ!
मैं खिलूंगा तब नयी बगिया खिलेगी!

शाम ने सबके मुखों पर रात मल दी,
मैं जला हूं¸ तो सुबह लाकर बुझूंगा,
ज़िंदगी सारी गुनाहों में बिताकर,
जब मरूंगा¸ देवता बनकर पुजूंगा,
आंसुओं को देखकर मेरी हंसी तुम–
मत उड़ाओ!
मैं न रोऊं¸ तो शिला कैसे गलेगी!

इस सदन में मैं अकेला ही दिया हूं,
जब मिलेगी रोशनी मुझसे मिलेगी।

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।