आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Free Me’ का भावानुवाद-

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता 

मुक्त कर दो मुझे

मुक्त कर दो मुझे, अपनी मधुरता के
बंधन से, और प्रिये! यह चुंबनों की मदिरा भी
अब और नहीं।

अगरबत्ती की तेज गंध से
मेरा दम घुटता है।

 

द्वार खोल दो, और सुबह का प्रकाश
भीतर आने दो।
मैं तुम में खो गया हूँ, तुम्हारे दुलार की
तहों के बीच लिपटा हुआ।

मुझे अपने जादू से मुक्त करो, और मुझे,
मेरे पुरुषत्व में लौटा दो, जिससे मैं तुम्हे समर्पित कर सकूं
अपना मुक्त हृदय।

-रवींद्रनाथ ठाकुर

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

Free Me

 

Free me from the bonds of your
sweetness, my love! Nor more of this
wine of kisses.

This mist of heavy incense stifles
my heart.

Open the doors, make room for the
morning light.

I am lost in you, wrapped in the
folds of your caresses.

Free me from your spells, and give
me back the manhood to offer you my
freed heart.

-Rabindranath Tagore

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

************