अक्सर मुझे हिंदी कवि सम्मेलनों के वे दिन याद आते हैं, जब मंचों से अनेक रचनाधर्मी कवि काव्य-पाठ किया करते थे। मंचों पर हिंदी गीत जमकर सुने जाते थे, कवि सम्मेलन और मुशायरे लाल-किले से लेकर छोट-छोटे कस्बों तक, कितने ही रचनाधर्मी कवि थे- बच्चन जी, दिनकर जी, नीरज जी से लेकर रमानाथ अवस्थी जी, रामावतार त्यागी जी, अगर मैं नाम लेता जाऊंगा तो यह पूरा आलेख ही उनसे भर जाएगा, और ऐसा नहीं है कि जिनका नाम अभी तक नहीं लिया वे कुछ कम महत्वपूर्ण थे। सैंकडों नाम ऐसे हैं, जो किसी न किसी मामले में अद्वितीय हैं।

 

 

बाद में कुछ ऐसा हुआ कि मंचों पर हास्य-व्यंग्य के कवियों का कब्ज़ा होता गया। हास्य के भी कुछ कवि मुझे बहुत पसंद हैं, जैसे स्व. ओम प्रकाश आदित्य जी, अल्हड बीकानेरी जी और भी अनेक ऐसे हास्य कवि हैं। लेकिन धीरे-धीरे ऐसे कवि आगे आ गए जो शुद्ध रूप से चुटकुले सुनाते हैं।

धीरे-धीरे उन पुराने कवियों से आगे बढ़कर हम आज के लोकप्रिय कवि श्री कुमार विश्वास जी तक आ गए, जिन्होंने गीत का मुहावरा ऐसा बना दिया जिसे श्रोता तुरंत ‘कैच’ करके उससे जुड़ जाते हैं, जैसे गज़ल के मुहावरे में होता है और इसके अलावा कुमार जी श्रोताओं को हंसाने के मामले में भी हास्य कवियों का मुकाबला करते हैं।
खैर आज मैं स्व. श्री रमानाथ अवस्थी जी का एक लोकप्रिय गीत आपके साथ शेयर कर रहा हूँ-

जीवन कभी सूना न हो,
कुछ मैं कहूँ, कुछ तुम कहो।

तुमने मुझे अपना लिया,
यह तो बड़ा अच्छा किया,
जिस सत्य से मैं दूर था,
वह पास तुमने ला दिया|

अब ज़िन्दगी की धार में,
कुछ मैं बहूँ, कुछ तुम बहो।

जिसका हृदय सुन्दर नहीं,
मेरे लिए पत्थर वही।
मुझको नई गति चाहिए,
जैसे मिले वैसे सही।

मेरी प्रगति की साँस में,
कुछ मैं रहूँ कुछ तुम रहो।

मुझको बड़ा सा काम दो,
चाहे न कुछ आराम दो,
लेकिन जहाँ थककर गिरूँ,
मुझको वहीं तुम थाम लो।

गिरते हुए इन्सान को,
कुछ मैं गहूँ कुछ तुम गहो।

संसार मेरा मीत है,
सौंदर्य मेरा गीत है,
मैंने अभी समझा नहीं,
क्या हार है क्या जीत है|

दुख-सुख मुझे जो भी मिले,
कुछ मैं सहूं कुछ तुम सहो।

– रमानाथ अवस्थी

नमस्कार।

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