आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य संकलन- ‘PoemHunter.com’ से लेता हूँ। लीजिए पहले प्रस्तुत है मेरे द्वारा किया गया उनकी कविता ‘Over The Green’ का भावानुवाद-

गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की कविता 

हरियाली के ऊपर

हरे और पीले धान के खेतों के ऊपर
तैरती जाती हैं छायाएं शरद के बादलों की
और उनके बाद, तेजी से उनका पीछा करती
धूप।

मधुमक्खियां अपने मधु की चुस्की लेना भूल जाती हैं;
प्रकाश की अधिकता से मदमस्त, वे बेमतलब इधर-उधर मंडराती
और गुनगुनाती हैं।

नदी के टापुओं पर बत्तखें
बिना किसी कारण, खुशी से शोर मचाती हैं।

आज कोई अपने घर वापस न जाए, बंधुओं,
आज की सुबह, कोई अपने काम पर न जाए।
आइए आज हम इस नीले आकाश पर धावा बोल दें,
और दौड़ते समय हम, समूचे अंतरिक्ष को लूट लें।

वायुमंडल में मधुर हास की ध्वनि तैरती है
जैसे बाढ़ के उफान पर झाग।
बधुओं, आइए हम अपनी सुबहों को, कुछ बेमतलब के
गीतों के हवाले कर दें।

-रवींद्रनाथ ठाकुर

 

और अब वह अंग्रेजी कविता, जिसके आधार मैं भावानुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ-

Over The Green

Over the green and yellow rice-fields
sweep the shadows of the autumn
clouds followed by the swift-chasing
sun.

The bees forget to sip their honey;
drunken with light they foolishly hover
and hum.
The ducks in the islands of the river
clamour in joy for mere nothing.

Let none go back home, brothers,
this morning, let none go to work.
Let us take the blue sky by storm
and plunder space as we run.

Laughter floats in the air like foam
on the flood.
Brothers, let us squander our
morning in futile songs.

-Rabindranath Tagore

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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