राजनीति में सरकारें बनती रहती हैं, कभी एक पार्टी सत्ता में आती है कभी दूसरी, लेकिन कांग्रेस की आज की स्थिति को देखकर महाभारत और रामायण के प्रसंग याद आते हैं। इन दोनों महाग्रंथों में जो दिखाया गया है, प्रत्येक में एक अत्यंत शक्तिशाली वंश का नाश होता है और उसके मूल में होता है केवल अहंकार! अहंकार के कारण ही कुरुवंश और रावण का वंश नष्ट हो जाते हैं, ये कहा गया – ‘जाके एक लाख पूत, सवा लाख नाती, सो रावण घर दिया ना बाती!’

 

 

पहले महाभारत का प्रसंग संक्षेप में ले लेते हैं। अहंकार में यही होता है कि इंसान अपने आपको इतना ऊंचा समझने लगता है कि जो उसको समझाना चाहता है, उसका भला चाहता है, वह उसको बहुत तुच्छ और अपना शत्रु नजर आता है।

महाभारत के प्रसंग में इतना ही कहना चाहूंगा कि स्वयं योगीराज श्रीकृष्ण दूत बनकर दुर्योधन के पास जाते हैं और कहते हैं कि युद्ध होने पर सब बर्बाद हो जाएंगे, इसलिए कौरव इतना भर कर दें कि पांच पांडवों के लिए केवल पांच गांव दे दें और वे समूचे हस्तिनापुर पर राज करते रहें। दुर्योधन ने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया और इस प्रकार अपने वंश के नाश के बीज बो दिए।

रामायण का प्रसंग मैं थोड़ा विस्तार से लिखूंगा, क्योंकि गोस्वामी तुलसीदास द्वारा सुंदर कांड में लिखा गया यह प्रसंग मुझे विशेष रूप से प्रिय है। हनुमान जी लंका को जलाकर अपना शक्ति-प्रदर्शन कर गए, सारे असुर डरे हुए रहते थे, लेकिन इससे रावण के अहंकार पर कोई फर्क नहीं पड़ा था।

ऐसे में रावण के छोटे भाई और साधु पुरुष- विभीषण जी रावण को समझाने आते हैं और क्या असर इसका महाबली और महा अहंकारी रावण पर पड़ता है, इसका बहुत सुंदर वर्णन गोस्वामी तुलसीदास जी ने किया है, आइए देखते हैं।

विभीषण जी, रावण को श्रीराम जी की शक्ति बताने के लिए कहते हैं-

 

नाथ राम नहीं नर भूपाला,
भुवनेश्वर कालहुं कर काला,
देहु नाथ प्रभु कहं वैदेही,
भजहू राम बिनु हेतु सनेही।

जासु नाम त्रय ताप नसावन,
सोई प्रभु प्रकट, समुझि जिय रावण।

बार-बार पग लागहूं, बिनय करहुं दसशीश,
परिहरि मान, मोह, मद-
भजहू कौशलाधीश।

बड़े विनीत भाव से विभीषण श्रीराम जी की शक्ति और उनके कृपालु स्वभाव का स्मरण कराते हुए रावण से कहते हैं कि वे सीता-माता को श्रीराम जी के पास लौटा दे।

इस पर महाघमंडी रावण क्या कहता और करता है-

सुनत दशानन उठा रिसाई,
खल तोही निकट मृत्यु अब आई,
कहसि न खल अस को जग माही,
भुज बल जाहि जिता मैं नाही,
जियसि सदा सठ मोर जियावा,
रिपु कर पच्छ मूढ़ तोहि भावा।

अस कहि कीन्हेसी चरण प्रहारा,
अनुज गहे पग बारहि बारा।

रावण से लात खाने पर भी विभीषण फिर कहते हैं-

तुम पितु सरिस भले ही मोहि मारा,
राम भजे हित नाथ तुम्हारा।

राम सत्य संकल्प निधि,
सभा कालवश तोर,
मैं रघुवीर शरण अब जाऊं,
देहु जनि खोर।

और तुलसीदास जी बताते हैं कि जब ऐसा बोलकर विभीषण जब वहाँ से जाते हैं, तभी से लंकावासी ‘आयुहीन’ हो गए थे!

अब कांग्रेस के बारे में क्या कहूं, ऐसे ही खयाल आ गया, जिस स्तर पर कांग्रेस अध्यक्ष अपनी पार्टी के प्रचार को इस बार ले गए, चोर-चोर के नारे तक, ऐसा प्रचार जिसको उनकी पार्टी के ही अच्छे नेता दोहराने से डरते थे। लेकिन वही राहुल गांधी हर किसी में कमी निकाल सकते हैं, लेकिन पार्टी में कोई उनकी कमी की तरफ इशारा नहीं कर सकता।

चलिए आज इस बहाने से ही यह खूबसूरत प्रसंग याद आ गया।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।