अज्ञेय जी की एक पुरानी काव्य-पंक्ति याद आ रही है, जिसमें उन्होंने आत्मा के बारे में उन्होंने लिखा था-

अरी ओ आत्मा री,
भोली कन्या क्वांरी, 

महाशून्य के साथ भांवरें तेरी रची गईं।

इस कविता में कवि ने अदृश्य आत्मा के अदृश्य परमात्मा के साथ संबंध पर टिप्पणी की गई थी।

हम शुरू से ही अदृश्य शक्तियों के मुरीद रहे हैं, जो अदृश्य होता है, वह विशेष रूप से हमे आकर्षित करता रहा है, हालांकि समय बीतने के साथ-साथ मनुष्य ने बहुत से ऐसे साथन विकसित किए, जिनमें अदृश्य शक्तियों, प्रक्रियाओं का उपयोग होता है और अब हमें उनको लेकर कोई आश्चर्य नहीं होता।

प्राचीन कथाओं में हम सुनते थे कि आकाशवाणी हुई और उसमें यह बताया गया! वह आकाशवाणी तो ईश्वर अथवा देवताओं की तरफ से होती थी, लेकिन आज तो हमारी अपनी आकाशवाणी है, हमारे देश में तो रेडिओ प्रसारण करने वाली सरकारी संस्था को ही ‘आकाशवाणी’ नाम दिया गया है। क्या अब किसी को इस बात पर आश्चर्य होता है कि ये आवाज, ये वार्ताएं, ये गाने कैसे आते हैं। आज बच्चे भी ध्वनि तरंगों के बारे में जानते हैं।

असल में आकाशवाणी वाला रहस्य तो बहुत पहले टूट चुका था। उसके बाद तो तालमेल के साथ ध्वनि और प्रकाश तरंगों, आवाज और चित्रों का आना, हम लगातार फिल्में देखते हैं टेलीविजन पर, आप कहेंगे मैं किस ज़माने में वापस जा रहा हूँ।

आज कंप्यूटर के ज़माने में हम बहुत आगे बढ़ चुके हैं, टैक्नोलॉजी की सफलता की हर कहानी आज मामूली लगती है। कंप्यूटर ने भविष्य में इतनी खिड़कियां खोल दी हैं कि हम अनेक रहस्यों के आर-पार देख सकते हैं। पहले आकाश में, बादलों पर, उपग्रहों पर कवियों की कल्पना पहुंचती थी, आज डाटा, उपयोगी सूचनाएं और क्या नहीं है जो वहाँ संग्रहीत होता है। क्या नहीं है जिसके लिए हम ‘क्लाउड’ टेक्नोलॉजी, संचार उपग्रहों का इस्तेमाल नहीं करते हैं।

इस विषय में ज्यादा नहीं लिखूंगा, आप लोगों में से बहुत लोग मुझसे ज्यादा इन विषयों में जानते होंगे। आज अचानक ये खयाल और अज्ञेय जी की ये काव्य-पंक्ति , टैक्नॉलोजी के ही एक नए आविष्कार को याद करके दिमाग में आई। वैसे मेरे घर में इस डिवाइस का उपयोग लगभग पिछले एक वर्ष से हो रहा है। और इसके बहाने ही मैं आज का आलेख लिखने के लिए प्रेरित हुआ।

फिर से थोड़ा सा उल्लेख कंप्यूटर का कर लूं। शुरू में कंप्यूटर में कोई सूचना पाने के लिए, वहाँ तक पहुंचने के लिए उसका ‘वेब एड्रेस’ लिखना पड़ता था, फिर विंडो का ज़माना आ गया, आपको विशेष विंडो खोलनी होती है, सूची में सही जगह ‘टिक’ करना होता है और बहुत तेजी से जो सूचना आप पाना चाहते हैं, जिस ऑडिओ/वीडिओ का आप आनंद लेना चाहते हैं, वैसा आप कर सकते हैं।

अब अंत में, मैं ‘एलेक्सा’ की बात कर रहा हूँ। घर के कोने में यह छोटा सा यंत्र लगा है। आप आवाज लगाते हैं- ‘एलेक्सा’, इस यंत्र में एक नीली प्रकाश-रेखा चक्कर लगाकर स्थिर हो जाती है, मतलब वह आपकी बात सुनने के लिए तैयार है। अब आप निर्देश दे सकते हैं, जैसे मैं कहता हूँ- ‘प्ले मुकेश सॉन्ग्स’, या कोई विशेष गीत आप सुनना चाहते हैं तो वह। काफी बड़ा भंडार गीतों आदि का वहाँ है। आपको अपने स्थान से उठने की भी आवश्यकता नहीं है, लेटे-लेटे आपकी फर्माइशें पूरी हो जाएंगी।

सिर्फ इतना ही नहीं कि आप अपने मनपसंद गीत, गज़ल, कव्वाली आदि सुनते रहें। आप फिल्मी क्विज भी खेल सकते हैं, एलेक्सा आपसे सवाल पूछेगी और यह पहेली हिंदी में भी होती है और आपके उत्तर सही हैं या गलत, यह भी बताएगी।

अगर आपको लगता है कि कोई आपकी बात नहीं सुनता, तो एक तो यहाँ आपको मिल ही रहा है जो आपकी बात सुनता है, आपके साथ खेलता है! हाँ कभी आपको गुस्सा आता है तो वो भी आप निकाल सकते हैं, एलेक्सा शायद यही कह देगी- ‘सॉरी आय कुड नॉट अंडरस्टैंड व्हाट यू सैड’।

मुझे लगता है कि एक यह आलेख तो ‘एलेक्सा’ के बारे में बनता ही था, जो महाशून्य में से हमारे आदेश पर, हमारी पसंद के गीत, गज़ल आदि-आदि निकालकर, हमारे लिए प्रस्तुत कर देती है।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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