पुराने कवि-कथाकारों की रचनाएं शेयर करने के क्रम में, मैं आज विख्यात कवि, कथाकार और धर्मयुग पत्रिका के संपादक रहे स्व. डॉ. धर्मवीर भारती जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।

यह फूल, मोमबत्तियां और टूटे सपने
ये पागल क्षण
यह काम–काज दफ्तर फाइल, उचटा सा जी
भत्ता वेतन,
ये सब सच है!

इनमें से रत्ती भर न किसी से कोई कम,
अंधी गलियों में पथभ्रष्टों के गलत कदम
या चंदा की छाया में भर भर आने वाली आँखे नम,
बच्चों की सी दूधिया हंसी या मन की लहरों पर
उतराते हुए कफ़न!

ये सब सच है!
जीवन है कुछ इतना विराट, इतना व्यापक
उसमें है सबके लिए जगह, सबका महत्व,
ओ मेजों की कोरों पर माथा रख–रख कर रोने वाले
यह दर्द तुम्हारा नही सिर्फ, यह सबका है।

सबने पाया है प्यार, सभी ने खोया है
सबका जीवन है भार, और सब जीते हैं।

बेचैन न हो–
यह दर्द अभी कुछ गहरे और उतरता है,
फिर एक ज्योति मिल जाती है,
जिसके मंजुल प्रकाश में सबके अर्थ नये खुलने लगते,
ये सभी तार बन जाते हैं।

कोई अनजान अंगुलियां इन पर तैर–तैर,
सबसे संगीत जगा देती अपने–अपने
गुंथ जाते हैं ये सभी एक मीठी लय में
यह काम–काज, संघर्ष विरस कड़वी बातें
ये फूल, मोमबत्तियां और टूटे सपने। 

यह दर्द विराट जिंदगी में होगा परिणत
है तुम्हे निराशा फिर तुम पाओगे ताकत
उन अँगुलियों के आगे कर दो माथा नत
जिसके छू लेने लेने भर से फूल सितारे बन जाते हैं ये मन के छाले,
ओ मेजों की कोरों पर माथा रख रख कर रोने वाले–
हर एक दर्द को नए अर्थ तक जाने दो?

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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