लीजिए अब हम गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित महाकाव्य श्रीरामचरितमानस के सुंदरकांड से कुछ अंश प्रस्तुत करने के सिलसिले के समापन की ओर बढ़ रहे हैं। जैसा मैंने पहले भी कहा है, मेरी यह प्रस्तुति मुकेश जी द्वारा गये गए अंश में से जितना मुझे याद है, उस पर आधारित है।

कल के प्रसंग में हनुमान जी बहुत से राक्षसों को मारकर, लंका में आग लगाने और सीता माता से श्रीराम जी की के लिए निशानी और उनका संदेश तथा आशीर्वाद प्राप्त करने के बाद लंका से वापस लौटे थे। गोस्वामी तुलसीदास जी ने यह अप्रतिम काव्य पूर्ण श्रद्धा के साथ लिखा और यह सच्चाई है कि इस कथा का लेखन, वाचन आदि सभी ईश्वर की प्रेरणा से ही संभव है। मुझसे मेरी अल्पबुद्धि के साथ इसको जिस प्रकार शेयर करना संभव हुआ वह मैंने किया है। इस सरस काव्य का आज का भाग भी आपके समक्ष प्रस्तुत है-

 

फटिक शिला बैठे दोउ भाई, परे सकल कपि चरनन्हि जाई,
पवन तनय के चरित सुहाए, जांबवंत रघुपतिहि सुनाए,
सुनत कृपानिधि मन अति भाए, कर गहि परम निकट बैठाए।
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सुन कपि तोहि समान उपकारी, नहीं कोई सुर, नर, मुनि तन धारी,
प्रति उपकार करहुं क्या तोरा, सन्मुख होइ न सकत जिय मोरा।
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सुनि प्रभु वचन बिलोकि मुख, गात हरष हनुमंत,
चरण परेउ प्रेमाकुल, त्राहि-त्राहि भगवंत।
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प्रभु उठाई कपि हृदय लगावा, कर गहि परम निकट बैठावा।
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तब रघुपति कपि-पतिहि बुलावा, कहा चले कर करहु बनावा,
अब विलंब केहि कारण कीजे, तुरत कपिन्ह कहुं आयसु दीजे।
चला कटुक को बरनै पारा, गरजहिं वानर भालु अपारा।
केहरिनाद भालु-कपि करहिं, डगमगाहिं दिग्गज चिक्करहिं।
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चिक्करहीं दिग्गज, डोल महि, गिरि लोल सागर खरभरे,
मन हरष सब गंदर्भ, सुर-मुनि, नाग किन्नरकिन्नर दुख टरे।
कटकटहिं मर्कटमर्कट, बिकट भटभट बहु कोटि-कोटिन्ह धावहिं,
जय राम प्रबल प्रताप, कौशल नाथ गुण गण गावहिं।
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एहि बिधि जाइ कृपानिधि उतरे सागर तीर,
जहं-तहं लागे खान फल, भालु बिपुल कपि बीर।
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हाँ मैं यह उल्लेख अवश्य करना चाहूंगा कि मानस कथा में अगला जो प्रसंग है, जिसमें हनुमान जी द्वारा लंका में आग लगाने और निशाचरों का संहार करने के बाद वहा लोग डरे हुए रहते हैं। ऐसे में विभीषण जी रावण को समझाने का प्रयास करते हैं कि राम से शत्रुता करना उनको बहुत भारी पड़ेगा लेकिन यह सलाह घमंडी रावण को अच्छी नहीं लगती और वह विभीषण जी को लात मारकर लंका से निकल जाने को कहता है। विभीषण जी तब प्रभु राम के पास जाने के लिए वहाँ से निकल जाते हैं।
यह प्रसंग मैंने सबसे पहले शेयर किया था, अब आगे विभीषण जी के श्रीराम जी के पास पहुंचने का वर्णन है-

दूरहि से देखे दोउ भ्राता, नयनानंद दान के दाता,
बहुरि राम छविधाम बिलोकी, रहेउ ठठुकि एकटक पल रोकी।
नयन नीर, पुलकित अति गाता, मन धरि धीर कही मृदु बाता,
श्रवन सुजसु सुनि आयउं, प्रभु भंजन भव भीर,
त्राहि-त्राहि आरति हरनहरन, सरन सुखद रघुबीर।
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जो नर होइ चराचर द्रोही, आवे सभय सरन तकि मोही,
तजि मद मोह, कपट छल नाना, करहुं सद्य तेहि साधु समाना।
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अस कहि राम तिलक तेहि सारा, सुमन बृष्टि नभ भई अपारा।
जो संपति सिव रावनहि, दीन्ह दिए दस माथ,
सोई संपदा विभीषनहि सकुची दीन्ह रघुनाथ।
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बिनय न मानहि जलधि जड़, गए तीन दिन बीत,
बोले राम सकोप तब, भय बिन होई न प्रीत।
लछमन बान सरासन आनू, सोखऊं बारिधि त्रिसिख कृसानु,
सभय सिंधु गहे पग प्रभु केरे, चमहु नाथ सब अवगुन मेरे।
नाथ नील-नल कपि दोउ भाई, लरिकाई रिषि आसिष पाई,
तिनके परस किए गिरि भारे, तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे।
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निज भवन गवनेऊ सिंधु, श्रीरघुपतिहि यह मत भायऊ,
यह चरित कलिमल-हर जथामति दास तुलसी गायऊ।
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सकल सुमंगल दायक, रघुनायक गुणगान,
सादर सुनहिं ते तरहिं भव-सिंधु बिना जलयान।

आज के लिए इतना ही, मैंने अपनी सीमित क्षमता के अनुसार, यह पावन प्रसंग शेयर करने का प्रयास किया, आशा है आपको पसंद आया होगा।

नमस्कार।

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