आज फिर से एक बार, मेरे प्रिय मंचीय कवियों में से एक स्व. भारत भूषण जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ। उनका यह गीत भी मुझे विशेष रूप से प्रिय है, इस गीत में कवियों और विशेष रूप से मंचीय कवियों की व्यथा की अभिव्यक्ति की गई है और यह पूछा गया कि सारी उम्र कविता के लिए, कवि सम्मेलनों में कविता-पाठ के लिए भटकते रहे, आखिर आपने हासिल क्या किया? किसने आपको दिल से अपनाया, किसको आपने हासिल किया- परिवार को, प्यार को, गीत को या देश को?

 

 

वैसे गीत को किसी भूमिका की आवश्यकता नहीं है, लीजिए प्रस्तुत है उनका यह गीत-

 

आधी उमर करके धुआँ, यह तो कहो किसके हुए
परिवार के या प्यार के, या गीत के या देश के।
यह तो कहो किसके हुए।

कंधे बदलती थक गईं सड़कें तुम्हें ढोती हुईं
ऋतुएँ सभी तुमको लिए दर-दर फिरीं रोती हुईं
फिर भी न टँक पाया कहीं, टूटा हुआ कोई बटन
अस्तित्व सब चिथड़ा हुआ गिरने लगे पग-पग जुए।

संध्या तुम्हें घर छोड़ कर, दीवा जला मंदिर गई
फिर एक टूटी रोशनी, कुछ साँकलों से घिर गई
स्याही तुम्हें लिखती रही, पढ़ती रहीं उखड़ी छतें,
आवाज़ से परिचित हुए, केवल गली के पहरूए ।

हर दिन गया डरता किसी, तड़की हुई दीवार से
हर वर्ष के माथे लिखा, गिरना किसी मीनार से
निश्चय सभी अँकुरान में, पीले पड़े मुरझा गए
मन में बने साँपों भरे, जालों पुरे अंधे कुएँ।

यह तो कहो किसके हुए ।

 

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

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