आज फिर से मैं अपने एक अत्यंत प्रिय गीत कवि स्व. भारत भूषण जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ। वे एक ऐसे गीत कवि थे जिनको सुनने के लालच के कारण बहुत सी बार किसी कवि सम्मेलन में जाना सार्थक हो जाता था।

भारत भूषण जी ने जहाँ जीवन की विसंगतियों पर अनेक गीत लिखे हैं, वहीं प्रेम और भावुकता से भरा यह गीत भी अत्यंत लोकप्रिय हुआ था।

लीजिए प्रस्तुत है यह प्यारा सा गीत-

 

जिस दिन भी बिछड़ गया मीता,
ढूँढती फिरोगी लाखों में।
फिर कौन सामने बैठेगा,
बंगाली भावुकता पहने,
औ दूर दूर से लाएगा,
केशों को गंध भरे गहने।
ये देह अजंता शैली सी
किसके गीतों में सँवरेगी,
किसकी रातें महकाएँगी
जीने के मोड़ों की छुअनें,
फिर चाँद उछालेगा पानी,
किसकी समुंदरी आँखों में।
दो दिन में ही बोझिल होगा
मन का लोहा, तन का सोना,
फैली बाहों सा दीखेगा
सूनेपन में कोना कोना।
किसके कपड़ों में टाँकोगे
अखरेगा किसकी बातों में,
पूरी दिनचर्या ठप होना।
दरकेगी सरोवरी छाती
धूलिया जेठ वैशाखों में।
ये गुँथे गुँथे बतियाते पल
कल तक गूँगे हो जाएँगे,
होंठों से उड़ते भ्रमर गीत
सूरज ढलते सो जाएँगे। 
जितना उड़ती है आयु परी
इकलापन बढ़ता जाता है,
सारा जीवन निर्धन करके
ये पारस पल खो जाएँगे।
गोरा मुख लिये खड़े रहना
खिड़की की स्याह सलाखों में।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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