काफी दिन से कविता, गीत-संगीत की बात नहीं हुई, ऐसे थोड़े ही चलेगा जी!
ठीक है कि अभी इंग्लैंड में हैं, लेकिन हैं तो हिंदुस्तानी ही ना जी। लंदन तो यहीं रहेगा और हम भी अभी कुछ दिन और यहाँ ही हैं।

अभी 27 अगस्त को मेरे परम प्रिय गायक और महान इंसान- मुकेश जी की पुण्य तिथि निकल गई। कितने महान इंसान और गायक थे वो, यह जो लोग उनके साथ रहे हैं उन्होंने विस्तार से बताया है और यह सरलता और निश्छलता उनकी आवाज में भी झलकती है।

 

बहुत से ऐसे गीत हैं जिनकी फिल्म और नायक लोगों को याद नहीं हैं, लेकिन मुकेश जी की अमर आवाज के कारण आज भी लोग उनको गुनगुनाते हैं। ऐसा ही एक गीत मैं आज शेयर कर रहा हूँ, जिसे जनाब नक्श लायलपुरी जी ने लिखा था, इसका संगीत दिया था- श्री सपन जगमोहन जी ने और चेतना – फिल्म के लिए मुकेश जी का गाया यह गीत – श्री अनिल धवन पर फिल्माया गया था।

लीजिए आज इस गीत को याद कर लेते हैं-

 

मैं तो हर मोड़ पर तुझको दूँगा सदा
मेरी आवाज़ को, दर्द के साज़ को, तू सुने ना सुने।
मुझे देखकर कह रहे हैं सभी
मोहब्बत का हासिल है दीवानगी,
प्यार की राह में, फूल भी थे मगर
मैंने कांटे चुने।
मैं तो हर मोड़ पर…

 

जहाँ दिल झुका था वहीँ सर झुका
मुझे कोई सजदों से रोकेगा क्या,
काश टूटे ना वो, आरज़ू ने मेरी
ख्वाब हैं जो बुने।
मैं तो हर मोड़ पर…

 

मेरी ज़िन्दगी में यही गम रहा
तेरा साथ भी तो बहुत कम रहा,
दिल ने साथी मेरे, तेरी चाहत में थे-
ख्वाब क्या क्या बुने।
मैं तो हर मोड़ पर…

 

तेरे गेसूओं का वो साया कहाँ
वो बाहों का तेरी सहारा कहाँ,
अब वो आँचल कहाँ, मेरी पलकों से जो,
भीगे मोती चुने।
मैं तो हर मोड़ पर तुझको दूँगा सदा।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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