आज फिर से अपने परम प्रिय गायक मुकेश जी का गाया एक अलग तरह का गीत शेयर कर रहा हूँ। सुकवि शैलेंद्र जी के लिखे इस गीत को मुकेश जी ने शंकर जयकिशन की प्रसिद्ध जोड़ी के संगीत निर्देशन में फिल्म- बेगुनाह के लिए गाया था और इसे राजेश खन्ना जी पर फिल्माया गया था।

मुकेश जी की मधुर वाणी सीधे दिल में उतर जाती है और दर्द की अभिव्यक्ति में तो वे माहिर थे ही, उनके गाये गीतों में कहीं ऐसा नहीं लगता कि धुन की मजबूरी में कहीं कथ्य की क़ुर्बानी दी जा रही है। हर शब्द को उसकी पूरी अर्थवत्ता और गहराई के साथ निभाते हैं मुकेश जी।

आइए गीत के बोलों को पढ़कर उनके गाये गीत को याद करते हैं-

 

 

ऐ प्यासे दिल बेज़ुबां,
तुझको ले जाऊं कहाँ।
आ..आ..आ।
आग को आग में ढाल के, कब तक जी बहलाएगा,
ऐ प्यासे दिल बेज़ुबां।

 

घटा झुकी और हवा चली तो हमने किसी को याद किया,
चाहत के वीराने को उनके गम से आबाद किया।
ऐ प्यासे दिल बेज़ुबां, मौसम की ये मस्तियां,
आ..आ..आ,
आग को आग में ढाल के, कब तक जी बहलाएगा,
ऐ प्यासे दिल बेज़ुबां।

 

तारे नहीं अंगारे हैं वो, चांद भी जैसे जलता है,
नींद कहाँ, सीने पे कोई भारी कदमों से चलता है,
ऐ प्यासे दिल बेज़ुबां, दर्द है तेरी दास्तां,
आ आ आ ।
आग को आग में ढाल के, कब तक जी बहलाएगा।
ऐ प्यासे दिल बेज़ुबां।

 

कहाँ वो दिन अब कहाँ वो रातें,
तुम रूठे, किस्मत रूठी,
गैर से भेद छुपाने को हम
हंसते फिरे हंसी झूठी।
ऐ प्यासे दिल बेज़ुबां, लुटके रहा तेरा जहाँ,
आ..आ..आ
ऐ प्यासे दिल बेज़ुबां।

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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