आज फिर से सपनों की बात करते हैं, सपने वे जो हम अपने जीवन के बारे में जीते-जागते देखते हैं, इतने कि वे हमारी नींद के दौरान भी आने के लिए मज़बूर हो जाएं।
मेरा सपना रहा है हमेशा से क्रिएटिव राइटिंग के क्षेत्र में नाम कमाने का। ऐसा नहीं है कि जीवन में कुछ आगे नहीं बढ़ा। असल में जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते हैं, वैसे-वैसे ही हमारी आंखों में बसने वाला क्षितिज भी, हमारी अपेक्षित मंज़िल भी आगे कदम बढ़ाती जाती है।

 

 

एक उदाहरण याद आता है, एक अमीर बच्चे को गरीबी पर निबंध लिखने को कहा गया, तब उसने लिखा- एक बच्चा था, वह बहुत गरीब था, उसके माता-पिता गरीब थे, उसका नौकर, उसका ड्राइवर, माली सभी गरीब थे। अब वह बेचारा यह जानता ही नहीं था कि गरीब लोगों के पास ये – नौकर, माली, ड्राइवर आदि-आदि नहीं होते।

खैर फिर अपनी बात पर आता हूँ, ठीक से पढ़ नहीं पाया था, कालेज की रैगुलर पढ़ाई नहीं हो पाई, शुरू में दिल्ली में दो-तीन नौकरियां प्राइवेट क्षेत्र में कीं, जिनमें से एक दिल्ली प्रैस में भी थी- सरिता, मुक्ता आदि-आदि पत्रिकाएं जहाँ से छपती हैं, वहाँ सर्कुलेशन विभाग में , उसके बाद स्टाफ सेलेक्शन कमीशन के माध्यम से लोवर डिवीजन क्लर्क के रूप में सचिवालय में नौकरी मिली और इस नौकरी में रहते हुए प्राइवेट छात्र के रूप में बी.ए. की परीक्षा पास की। इस नौकरी में रहते हुए यही संभावना थी कि रिटायर होते-होते सचिवालय में एसिस्टेंट अथवा अधिक से अधिक सेक्शन ऑफिसर बन पाऊंगा।

इस बीच जहाँ अपने सपनों को अभिव्यक्ति देने की बात है, कविताएं लिखता रहा, दिल्ली में कवि-गोष्ठियों में, आकाशवाणी आदि में भी कविता-पाठ के लिए जाता रहा। यह सब विवरण मैं अपने शुरू के ब्लॉग्स में लिख चुका हूँ, जहाँ जीवन की गति-अगति का पूरा ज़िक्र किया है।

इस बीच एक और घटना हुई, स्टाफ सेलेक्शन के ही माध्यम से मैंने परीक्षा पास की और अनुवादक बनकर आकाशवाणी, जयपुर चला गया, इस बीच मैंने दिल्ली विश्वविद्यालय से अनुवाद में डिप्लोमा कर लिया था और वह इसमें बहुत सहायक हुआ। यह ‘सुपरवाइज़र’ श्रेणी का पद था, अर्थात एलडीसी और यूडीसी के दो स्तर पार हो गए थे, जिनको पार करने में वहाँ पूरा सेवाकाल भी लग सकता था!

आकाशवाणी, जयपुर में 3 वर्ष तक रहा और इस बीच हिंदी में एम.ए. भी कर लिया। 3 वर्ष के बाद मुझे हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड में अनुवादक का पद मिला, जो एग्जीक्यूटिव श्रेणी में था, इस प्रकार यह बड़ा पायदान था और सपने देखने के लिए अब सामने विस्तृत आकाश था। यहाँ एक बात और कि इस पद के लिए एक पूर्व केंद्रीय मंत्री के स्टाफ का व्यक्ति भी आया था, जो मान रहा था कि सेलेक्शन तो उसका ही होना है, लेकिन मैं चुना गया, यह सब मैंने विस्तार से शुरू के ब्लॉग्स में लिखा है।

मैं ज्यादा विस्तार में नहीं जाऊंगा, यहाँ मेरा उद्देश्य अपने सेवाकाल का पूरा विवरण देना नहीं, वह सब तो शुरू के ब्लॉग्स में आ ही चुका है, मैं इतना ही उल्लेख करना चाहता हूँ कि पहली नौकरी जो शायद 1967 में दिल्ली के पीतांबर बुक डिपो में रु. 100/- प्रतिमाह पर शुरू की थी, वहाँ से 2010 में एनटीपीसी में आज के लिहाज से उप महाप्रबंधक स्तर तक की यात्रा, हर लिहाज से संतोषजनक कही जा सकती है। लेकिन जैसे-जैसे यात्रा आगे बढ़ती जाती है, सपनों की ऊंचाई भी बढ़ती जाती है।

आज यह विवरण दे दिया, सेवा यात्रा का संक्षेप में, अब सपनों की बात कल करूंगा, पहले जिसका ज़िक्र किया था उस फिल्मी गीत की एक पंक्ति फिर से दोहराना चाहूंगा-

वो तय कर लेगा मंज़िल, जो इस सपना अपनाए।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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