आज डॉ. शांति सुमन जी का लिखा एक नवगीत याद आ रहा है, जो बहुत साल पहले झारखंड में आयोजित एक कवि सम्मेलन में पहली बार उनके मुंह से सुना था। उस समय मैं हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड की मुसाबनी माइंस में कार्यरत था, जो काफी पहले बंद हो चुकी हैं, यह शायद 1984-85 की बात है।

अक्सर यह गीत अचानक याद आ जाता है, जिसमें गांव के परिवेश में, बड़ी सरल भाषा में आम इंसानों की व्यथा का प्रभावी वर्णन किया गया है। वास्तव में बहुत अच्छा नवगीत है, लीजिए इसका आनंद लीजिए-

 

 

थाली उतनी की
उतनी ही
छोटी हो गई रोटी।
कहती बूढ़ी दादी
अपने गाँव की,
सबसे बूढ़ी दादी
अपने गाँव की ।

 

फेन फूल से
उठे मगर
राखों के ढेर हुए,
धँसे हुए
आँखों के किस्से
हम मुठभेड़ हुए,
भूख हुई
अजगर -सी
सूखी तन
की बोटी-बोटी
कहती बड़की काकी
अपने गांव की,
सबसे सुन्दर काकी
अपने गांव की ।

 

अपना तो घर
गिरा, दरोगा के
घर नए उठे,
हाथ और मुंह के
रिश्ते में
ऐसे रहे जुटे,
सिर से पांवों
की दूरी अब
दिन-दिन
होती छोटी ।
कहती नवकी भौजी
अपने गाँव की,
सबसे गोरी भौजी
अपने गाँव की ।

 

करना होगा
खत्म हमें यह,
सूद उगाही लहना,
लापरवाह
व्यवस्था के
खूँटे में बँधकर रहना
नाम भूख का
रोटी पर, 
जीतेगी अपनी गोटी ।
कहती रानी बहना
अपने गांव की,
सबसे प्यारी बहना
अपने गांव की ।

 

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार।

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