लंबे समय के बाद एक बार फिर मुंबई जा रहा हूँ। बहुत पहले मुंबई में दो बार रहा हूँ, एक बार 2000 से 2001 तक, एक वर्ष अंधेरी (पूर्व) में, पवई में रहा था और उसके बाद 2012 में शायद 3 महीने तक अंधेरी (पश्चिम) में रहा था। तब मैं ब्लॉग नहीं लिखता था, इसलिए इस बार विशेष रूप से एक नई निगाह से फिल्म नगरी, माया नगरी, भारतवर्ष की आर्थिक राजधानी मुंबई को देखने के लिए कम से कम 4 दिन का समय निकाल रहा हूँ, देखें क्या कुछ कवर कर पाता हूँ, इस नगरी से, जिसका बहुत मोह रहा है।

जीवन का अधिकांश समय दिल्ली, एनसीआर, यूपी, एमपी, बिहार और राजस्थान में बिताया, जो सभी समुद्र से दूर थे। आज से तीन वर्ष पहले गोवा आ गया, जहाँ कितनी समुद्री ‘बीच’ हैं कहना मुश्किल है, समुद्र का दृश्य अपने घर से ही दिखाई देता है। हाँ इससे पहले समुद्र का अनुभव मुंबई में ही मिला था, अब तक वह समय याद आता है।

हाँ तो इसके बाद कुछ दिन यात्रा संबंधी ब्लॉगिंग के लिए समर्पित होंगे, जिसके अंतर्गत मैं मुंबई और हैदराबाद जाऊंगा और शायद बंगलौर भी थोड़ा-बहुत कवर कर सकूं।

आज के लिए इतना ही, एक पुराना गीत याद आ रहा है, फिल्म- 1956 में रिलीज़ हुई सीआईडी के लिए मजरूह सुल्तानपुरी साहब के लिखे इस गीत को रफी साहब और गीता दत्त जी ने गाया था, हाँ उस समय मुंबई का नाम- बंबई या बॉम्बे हुआ करता था, और हाँ इस महानगर का चरित्र तो लगभग ऐसा ही था, जिसे इस गीत में बखूबी दर्शाया गया है-

 

 

ऐ दिल है मुश्किल जीना यहाँ
ज़रा हट के, ज़रा बच के
ये है बॉम्बे मेरी जाँ

 

कहीं बिल्डिंग, कहीं ट्रामे, कहीं मोटर, कहीं मिल
मिलता है यहाँ सब कुछ, इक मिलता नहीं दिल
इन्साँ का नहीं कहीं नाम-ओ-निशाँ
ज़रा हट के…

 

कहीं सट्टा, कहीं पत्ता, कहीं चोरी, कहीं रेस
कहीं डाका, कहीं फाँका, कहीं ठोकर, कहीं ठेस
बेकारों के हैं कई काम यहाँ
ज़रा हट के…

 

बेघर को आवारा यहाँ कहते हँस-हँस
खुद काटे गले सबके, कहे इसको बिज़नस
इक चीज़ के है कई नाम यहाँ
ज़रा हट के…

 

बुरा दुनिया को है कहता, ऐसा भोला तो ना बन
जो है करता, वो है भरता, है यहाँ का ये चलन
दादागिरी नहीं चलने की यहाँ
ये है बॉम्बे…
ऐ दिल है मुश्किल…

 

ऐ दिल है आसाँ जीना यहाँ
सुनो मिस्टर, सुनो बन्धु
ये है बॉम्बे मेरी जाँ। 

 

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।

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