मेरी उपलब्ध रचनाएं यहाँ शेयर करने का आज तीसरा दिन है, इस प्रकार जहाँ इन सबको, जितनी उपलब्ध हैं, एक साथ शेयर कर लूंगा जिससे यदि कभी कोई संकलनकर्ता इनको ऑनलाइन संकलन में शामिल करना चाहे तो कर ले। इसके लिए मैं अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में जिस क्रम में कविताएं पहले शेयर की हैं, उसी क्रम में उनको लेकर यहाँ पुनः एक साथ शेयर कर रहा हूँ।

जैसा मैंने पहले भी बताया है, हमेशा ‘श्रीकृष्ण शर्मा’ नाम से रचनाएं लिखता रहा, उनका प्रकाशन/ प्रसारण भी हमेशा इसी नाम से हुआ, नवगीत से संबंधित पुस्तकों/ शोध ग्रंथों में भी मेरा उल्लेख इसी नाम से आया है, लेकिन अब जबकि मालूम हुआ कि इस नाम से कविताएं आदि लिखने वाले कम से कम दो और रचनाकार रहे हैं, इसलिए अब मैं अपनी कविताओं को पहली बार श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ नाम से प्रकाशित कर रहा हूँ, जिससे एक अलग पहचान बनी रहे।

लीजिए आज इस क्रम की इस तीसरी पोस्ट में दो और रचनाओं को शेयर कर रहा हूँ-

दिल्ली में अपनी प्रारंभिक सेवाओं में से दूसरी प्रायवेट नौकरी अर्थात दिल्ली प्रेस, झंडेवालान में सेवा के दौरान ट्रेन में दैनिक यात्रा के अनुभव भी बहुत रोचक थे, शाहदरा से झंडेवालान तक जाने के लिए, और इस दौरान रचनाएं भी बहुत सी लिखी गईं।

साम्यवाद में ऐसी अवधारणा है कि मेहनतकश मिलकर शोषण के विरुद्ध सामूहिक लड़ाई लड़ते हैं, लेकिन मैं देखता हूँ कि ‘दिल्ली प्रेस’ जैसी संस्थाएं तो शोषण के ही महाकेंद्र हैं, महानगरों में ऐसे संस्थानों की भीड़ है, और कर्मचारीगण सुबह से ही बस,ट्रेन और अब मैट्रो भी, की लाइनों में लग जाते हैं, जीवन-यापन की व्यक्तिगत लड़ाई लड़ने के लिए।

उन दिनों लिखा एक गीत शेयर कर रहा हूँ, जो काफी लोकप्रिय हुआ था-

 

महानगर का गीत

-श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष

 

नींदों में जाग-जागकर, कर्ज़ सी चुका रहे उमर,
सड़कों पर भाग-भागकर, लड़ते हैं व्यक्तिगत समर।
छूटी जब हाथ से किताब, सारे संदर्भ खो गए,
सीमाएं बांध दी गईं, हम शंटिंग ट्रेन हो गए,
सूरज तो उगा ही नहीं, लाइन में लग गया शहर,
लड़ने को व्यक्तिगत समर।

 

व्यापारिक-साहित्यिक बोल, मिले-जुले कहवाघर में,
एक फुसफुसाहट धीमी, एक बहस ऊंचे स्वर में,
हाथों में थामकर गिलास, कानों से पी रहे ज़हर।
कर्ज़ सी चुका रहे उमर।

 

मीलों फैले उजाड़ में, हम पीली दूब से पले,
उतने ही दले गए हम, जितने भी काफिले चले,
बरसों के अंतराल से गूंजे कुछ अपने से स्वर,
क्रांति चेतना गई बिखर।

 

 

और यह दूसरी कविता भी दिल्ली प्रेस में सेवा के दौरान की ही है, जब एशिया 72 प्रदर्शनी लगी थी, मैं उसे देखने गया लेकिन लेट हो गया और तब मैंने बगल में स्थित पुराना किला देखा, जिसके बाहर डीडीए ने फुलवारी बनाकर सजावट की हुई थी। उसको देखने के बाद ही ये गीत लिखा था|कम से कम इस गीत के लेखन का वर्ष मुझे याद रहता है, क्योंकि उस समय एशिया-72 प्रदर्शनी लगी थी, इसलिए कह सकता हूँ कि यह 1972 में लिखा गया था। लीजिए प्रस्तुत है आज का यह दूसरा गीत-

 

 

खंडहर गीत

 

तुम उजाडों से न ऊब जाओ कहीं
मैं सजाता रहा खंडहर इसलिए।
ये तिमिर से घिरी राजसी सीढ़ियां,
इनसे चढ़ती उतरती रही पीढ़ियां,
युग बदलते रहे,तंत्र गलते गए,
टूटती ही रहीं वंशगत रूढ़ियां।
था कभी जो महल, बन वही अब गया,
बेघरों के लिए है, बसेरा प्रिये।
मैं सजाता रहा खंडहर इसलिए।

 

कल कहानी बना आज मेरे लिए
उस कहानी के संकेत मिलते यहाँ,
भूल जाते हैं जब अपना इतिहास हम
ठोकरें फिर पुरानी हैं पाते वहाँ,
अपने जीवन की उपलब्धियों की ध्वजा
मैं फिराता रहा हर डगर इसलिए।
मैं सजाता रहा खंडहर इसलिए।

 

आज की सप्तरंगी छटाएं सभी
एक दिन खंडहर ही कही जाएंगी,
देखकर नवसृजन की विपुल चंद्रिका
अपनी बदसूरती पर ये शरमाएंगी,
स्नेह की नित्य संजीवनी यदि न हो,
ज़िंदगी भी तो एक खंडहर है प्रिये,
मैं सजाता रहा खंडहर इसलिए।

-श्रीकृष्णशर्मा ‘अशेष’ 

 

आज के लिए इतना ही,
आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत है।
नमस्कार।