मेरी उपलब्ध रचनाएं यहाँ शेयर करने का आज सातवां दिन है, इस प्रकार जहाँ इन सबको, जितनी उपलब्ध हैं, एक साथ शेयर कर लूंगा जिससे यदि कभी कोई संकलनकर्ता इनको ऑनलाइन संकलन में शामिल करना चाहे तो कर ले। इसके लिए मैं अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में जिस क्रम में कविताएं पहले शेयर की हैं, उसी क्रम में उनको लेकर यहाँ पुनः एक साथ शेयर कर रहा हूँ।

जैसा मैंने पहले भी बताया है, हमेशा ‘श्रीकृष्ण शर्मा’ नाम से रचनाएं लिखता रहा, उनका प्रकाशन/ प्रसारण भी हमेशा इसी नाम से हुआ, नवगीत से संबंधित पुस्तकों/ शोध ग्रंथों में भी मेरा उल्लेख इसी नाम से आया है, लेकिन अब जबकि मालूम हुआ कि इस नाम से कविताएं आदि लिखने वाले कम से कम दो और रचनाकार रहे हैं, इसलिए अब मैं अपनी कविताओं को पहली बार श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ नाम से प्रकाशित कर रहा हूँ, जिससे एक अलग पहचान बनी रहे।

लीजिए आज इस क्रम की इस सातवीं पोस्ट में दो और रचनाओं को शेयर कर रहा हूँ-

पहली कविता, जीवन की नीरसता, जड़ता में लोग किस प्रकार इसका शिकार बने लोगों के व्यवहार से ही आनंद लेने लगता हैं और कितना गहरा प्रभाव यह जड़ता कुछ लोगों पर छोड़ती है, ये कविता उसकी बानगी है-

 

जड़ता के बावज़ूद

श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’

चौराहे पर झगड़ रहे थे
कुछ बदनाम चेहरे,
आंखों में पुते वैमनस्य के बावज़ूद
भयानक नहीं थे वे।
भीड़ जुड़ी
और करने लगी प्रतीक्षा-
किसी मनोरंजक घटना की।
कुछ नहीं हुआ,
मुंह लटकाए भीड़
धाराओं में बंटी और लुप्त हो गई।
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अगले चौराहे पर,
अब भी जुटी है भीड़
जारी है भाषण-
एक फटे कुर्ते-पाजामे का,
हर वाक्य
किसी जानी-पहचानी-
नेता या अभिनेता मुद्रा में,
भीड़ संतुष्ट है यह जान
कि एक और व्यक्ति हो गया है पागल,
जिसके मनोरंजक प्रलाप
बहुतों को नहीं खोने देंगे
मानसिक संतुलन-
जड़ता के बावज़ूद।

 

और एक गीत, जो मैंने दिल्ली में एक कवि गोष्ठी से सर्दी की रात में ट्रेन द्वारा शाहदरा लौटते हुए लिखा था-

 

रात शीत की

रजनी गुज़र रही है, सुनसान रास्तों से
गोलाइयों में नभ की, जुगनू टंके हुए हैं।

 

हर चीज़ पर धुएं की,एक पर्त चढ़ गई है,
कम हो गए पथिक पर, पदचाप बढ़ गई है,
यह मोड़ कौन सा है, किस ओर जा रहा मैं,
यूं प्रश्न-चिह्न धुंधले, पथ पर लगे हुए हैं।

 

अब प्रश्न-चिह्न कल के, संदर्भ हो गए हैं,
कुछ तन ठिठुर- ठिठुरकर, निष्कंप सो गए हैं,
कितने बंटे हैं कंबल, अंकित है फाइलों में,
फुटपाथ के कफन पर, किसके गिने हुए हैं।

 

अब सो चुकी है जल में, परछाइयों की बस्ती,
चंदा ही खे रहा है, बस चांदनी की कश्ती,
चिथड़ों में गूंजती हैं, अब कर्ज़दार सांसें,
पर ब्याज के रजिस्टर, अब भी खुले हुए हैं।

 

-श्रीकृष्णशर्मा ‘अशेष’

आज के लिए इतना ही,
आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत है।
नमस्कार।

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