मेरी उपलब्ध रचनाएं यहाँ शेयर करने का आज ग्यारहवां दिन है, इस प्रकार जहाँ इन सबको, जितनी उपलब्ध हैं, एक साथ शेयर कर लूंगा जिससे यदि कभी कोई संकलनकर्ता इनको ऑनलाइन संकलन में शामिल करना चाहे तो कर ले। इसके लिए मैं अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में जिस क्रम में कविताएं पहले शेयर की हैं, उसी क्रम में उनको लेकर यहाँ पुनः एक साथ शेयर कर रहा हूँ।

जैसा मैंने पहले भी बताया है, हमेशा ‘श्रीकृष्ण शर्मा’ नाम से रचनाएं लिखता रहा, उनका प्रकाशन/ प्रसारण भी हमेशा इसी नाम से हुआ, नवगीत से संबंधित पुस्तकों/ शोध ग्रंथों में भी मेरा उल्लेख इसी नाम से आया है, लेकिन अब जबकि मालूम हुआ कि इस नाम से कविताएं आदि लिखने वाले कम से कम दो और रचनाकार रहे हैं, इसलिए अब मैं अपनी कविताओं को पहली बार श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ नाम से प्रकाशित कर रहा हूँ, जिससे एक अलग पहचान बनी रहे।

लीजिए आज इस क्रम की इस ग्यारहवीं पोस्ट में तीन और रचनाओं को शेयर कर रहा हूँ-

पहली कविता- बस गांव को याद करके लिखी गई है, कैसे होते थे गांव, कैसी छवि हमारे मन में है गांवों की और आज कैसे हो गए हैं।

 

गांव के घर से

श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’

बेखौफ चले आइए
यहाँ अभी भी कुछ लोग हैं।
घर की दीवारों पर जो स्वास्तिक चिह्न बने हैं,
इन्हीं पर कई बार टूटी हैं चूड़ियां,
टकराए हैं माथे।
कभी यह एक जीवंत गांव था,
लेकिन आज, हर जीवित गंध- एक स्मारक है,
जमीन का हर टुकड़ा, लोगों की गर्दन पर गंडासा है।
धुएं का आकाश रचती चिमनियां, और यंत्र संगीत,
न जाने कहाँ उड़ा ले गया- उन गंध पूरित लोगों को।
एक, शहर में- सही गलत का वकील है,
पड़ौस को उससे बड़ी उम्मीदें हैं।

श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’

 

और कविता की ये पंक्तियां, कभी दीपावली के आसपास ही लिखी थीं। बहुत साल पहले, कब, ये याद नहीं है। पंक्तियां इस तरह हैं-

हम भी अंबर तक, कंदील कुछ उड़ाते
पर अपने जीवन में रंग कब घुले।
हमको तो आकर हर भोर किरण
दिन का संधान दे गई,
अनभीगे रहे और बारिश
एक तापमान दे गई।
आकाशी सतहों पर लोट-लोट जाते,
पर अपने सपनों को पंख कब मिले॥

श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’

अपने एक अधूरे गीत को शेयर कर रहा हूँ, अधिकांश समय मैंने महानगर दिल्ली में बिताया है, कविता के मंचों पर भी कभी-कभार जाता था और अक्सर ऐसे मंचों पर जाने वालों से मित्रता थी, सो कुछ भाव इस पृष्ठभूमि से जुड़े हुए इस गीत में आ गए, यह गीत वैसे मैंने किसी गोष्ठी में पढ़ा भी नहीं है-

महानगर धुआंधार है
बंधु आज गीत कहाँ गाओगे!
ये जो अनिवार, नित्य ऐंठन है-
शब्दों में व्यक्त कहाँ होती है,
शब्द जो बिखेरे भावुकता में,
हैं कुछ तो, मानस के मोती हैं।
मौसम अपना वैरागी पिता-
उसको किस राग से रिझाओगे।
बंधु आज गीत कहाँ गाओगे॥

-श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’

आज के लिए इतना ही,
आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत है।

नमस्कार।

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