मेरी उपलब्ध रचनाएं यहाँ शेयर करने का आज बीसवां दिन है, इस प्रकार जहाँ इन सबको, जितनी उपलब्ध हैं, एक साथ शेयर कर लूंगा जिससे यदि कभी कोई संकलनकर्ता इनको ऑनलाइन संकलन में शामिल करना चाहे तो कर ले। इसके लिए मैं अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में जिस क्रम में कविताएं पहले शेयर की हैं, उसी क्रम में उनको लेकर यहाँ पुनः एक साथ शेयर कर रहा हूँ।

जैसा मैंने पहले भी बताया है, हमेशा ‘श्रीकृष्ण शर्मा’ नाम से रचनाएं लिखता रहा, उनका प्रकाशन/ प्रसारण भी हमेशा इसी नाम से हुआ, नवगीत से संबंधित पुस्तकों/ शोध ग्रंथों में भी मेरा उल्लेख इसी नाम से आया है, लेकिन अब जबकि मालूम हुआ कि इस नाम से कविताएं आदि लिखने वाले कम से कम दो और रचनाकार रहे हैं, इसलिए अब मैं अपनी कविताओं को पहली बार श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ नाम से प्रकाशित कर रहा हूँ, जिससे एक अलग पहचान बनी रहे।

उस समय जो कविताएं किसी हद तक ‘परफेक्ट’ लगती थीं उनको मित्रों के बीच, गोष्ठियों में पढ़ देता था। बहुत सी पांडुलिपियां ऐसी होती थीं जिनको लेकर तसल्ली नहीं होती थी।

ऐसी ही कुछ कागज़ पर सुरक्षित कविताएं, जिनको मैंने उस समय फाइनल नहीं माना और बाद में उनको फाइनल रूप देने का समय नहीं मिला, आज की तारीख में सोचता हूँ कि उनको ‘जैसी हैं, जहाँ हैं, वैसी शेयर कर लेता हूँ।

इसी क्रम में लीजिए प्रस्तुत है आज का गीत-

 

गीतों के सुमन जहाँ महके थे,
वह ज़मीन-
दूर, बहुत दूर।

 

अजनबी हवाएं,मौसम आदमखोर,
हर तरफ फिजाओं में जहरीला शोर,
सरसों की महक और
सरकंडी दूरबीन,
दूर, बहुत दूर।

 

कुछ हुए हवाओं में गुम, कुछ को धरती निगल गई,
जो भी अपने हुए यहाँ, उन पर तलवार चल गई,
दिवराती सांझ और
फगुआती भोर,
दूर, बहुत दूर।

 

मौसम के साथ-साथ बदले साथी,
दुनिया में सब-सुविधा के बाराती,
दुर्दिन में बंधी रहे-
वह कच्ची डोर,
दूर, बहुत दूर।

 

गीत पंक्ति जैसी आती मीठी याद,
कडुवे अनुभव भी देते मीठा स्वाद,
चांद हुआ बचपन
आहत मन चकोर
तकता कितनी दूर।

-श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’

 

आज के लिए इतना ही,
आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत है।
नमस्कार।

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