आज स्व. रमेश रंजक जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ। इस गीत में रंजक जी ने नए कवियों को संबोधित करते हुए यह संदेश दिया है कि वे मौलिकता पर पूरा ध्यान दें। अक्सर यह होता है कि लोग तेजी से आगे बढ़ने के लिए दूसरों की नकल करने लगते हैं, बहुत से लोग तो ऐसे भी होते हैं जो दूसरों की काव्य पंक्तियां, अभिव्यक्तियां अपने नाम से प्रकाशित/ प्रसारित कर लेते हैं।

मौलिकता ही वास्तव में रचनाकार की अपनी पहचान बनाती है और सच्चे रचनाकार को ख्याति दिला सकती है। प्रस्तुत है स्व. रमेश रंजक जी की यह रचना-

 

 

वक़्त तलाशी लेगा
वह भी चढ़े बुढ़ापे में
सँभल कर चल ।
कोई भी सामान न रखना
जाना-पहचाना,
किसी शत्रु का, किसी मित्र का
ढंग न अपनाना,
अपनी छोटी-सी ज़मीन पर
अपनी उगा फसल
सँभल कर चल ।
ख्वारी हो सफ़ेद बालों की
ऐसा मत करना,
ज़हर जवानी में पी कर ही
जीती है रचना,
जितना है उतना ही रख
गीतों में गंगाजल,
वे जो आएंगे
छानेंगे कपड़े बदल-बदल,
सँभल कर चल ।

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

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