आज एक प्रसिद्ध गज़ल को शेयर कर रहा हूँ, जिसे शहरयार जी ने लिखा था औरऔर इसको 1981 में रिलीज़ हुई फिल्म- उमराव जान के लिए, आशा भौंसले जी ने खय्याम जी के संगीत निर्देशन में गाया था।

यह खूबसूरत गज़ल एक तरह से जीवन फिलासफी को बताती है। ज़िंदगी को बहुत सी कविताओं में, शायरी में सफर भी कहा जाता है। हम ज़िंदगी में बहुत तरह के सपने लेकर आगे बढ़ते जाते हैं, कभी कुछ हमारे मन का मिलता है लेकिन अनुभव तो हर घड़ी मिलते ही जाते हैं।

 

 

लीजिए प्रस्तुत है यह खूबसूरत गज़ल-

 

जुस्तजू जिसकी थी उसको तो न पाया हमने,
इस बहाने से मगर देख ली दुनिया हमने।

 

तुझको रुसवा न किया, खुद भी पशेमाँ न हुए,
इश्क़ की रस्म को इस तरह निभाया हमने।
जुस्तजू जिसकी थी…

 

कब मिली थी कहाँ बिछड़ी थी, हमें याद नहीं,
ज़िंदगी तुझको तो, बस ख़्वाब में देखा हमने।
जुस्तजू जिसकी थी…

 

ऐ अदा और सुनाएं भी तो क्या हाल अपना,
उम्र का लम्बा सफ़र तय किया तन्हा हमने।
जुस्तजू जिसकी थी…

 

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

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