एक बार फिर से मैं अपने एक प्रिय कवि-नवगीतकार रहे स्व. रमेश रंजक जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ।हूँ। यह गीत रंजक जी के 1969 में प्रकाशित हुए नवगीत संकलन ‘हरापन नहीं टूटेगा’ से लिया गया है।

आजकल दुनिया में जो कोरोना की महामारी फैली है, हजारों लोग इस भयावह रोग की भेंट चढ़ चुके हैं, ऐसे में अचानक यह गीत भी, जो जीवन की नश्वरता को रेखांकित करता है, याद आ रहा है, अक्सर बार ऐसा भी होता है ना कि कोई व्यक्ति अंतिम सांस लेने से पहले किसी प्रियजन से मिलने के लिए बहुत बेचैन होता है। लीजिए प्रस्तुत है यह गीत-

 

 

एक लतर सपने के आतुर आधार के लिए,
मन के संसार के लिए।
जैसे रोगी सूने गाँव में पुकारे,
साधे हो साँस
किसी नाम के सहारे,
वैसे ही एक उमर पुतलियाँ उघारे,
आकुल उपचार के लिए।
छाया तक साथ नहीं बैठी सिरहाने,
केवल कीं नंगी
अठखेलियाँ हवा ने,
एक लचर मृग-तृष्णा लाँघ कर सिवाने,
प्यासी आकार के लिए।

आज के लिए इतना ही।
नमस्कार।

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